Saturday, 21 April 2018

लाला लाजपत राय की जीवनी - Lala Lajpat Rai Biography In Hindi

लाला लाजपत राय की जीवनी – Lala Lajpat Rai Biography In Hindi

दोस्तों आज के आर्टिकल (Biography) में जानते हैं, आजीवन ब्रिटिश राजशक्ति का सामना करते हुए अपने प्राणों की परवाह न करने वाले, साइमन कमीशन के विरुद्ध प्रदर्शन के दौरान शहीद होने वाले “लाला लाजपत राय की जीवनी” (Lala Lajpat Rai Biography) के बारे में.

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एक झलक Lala Lajpat Rai की जीवनी पर :लाला लाजपत राय का जन्म पंजाब के  फ़रीदकोट जिले में स्थित दुधिके गॉव में 28 जनवरी 1865 को हुआ. यह गाँव इनका  ननिहाल हैं. इनके पिता जी का नामलाला राधाकृष्ण था और माता जी का नाम गुलाब देवी था अपने माता के ये ज्येष्ठ पुत्र थे. और ये बनिया जाति के अग्रवाल थे.
 
इनके पिता जी लाला राधाकृष्ण उर्दू तथा फ़ारसी के अच्छे जानकार थे और पेशे से एक अध्यापक थे. और इन्हें इस्लाम में भी गहरी आस्था थी. जिसके कारण ये नमाज़ भी पढ़ते थे और रमज़ान के महीने में रोज़ा  भी रखते थे. लाजपत राय जी के पिता वैश्य (अग्रवाल) थे, किंतु उनकी माती सिक्ख परिवार से थीं.

शिक्षा :
इनकी प्रारम्भिक शिक्षा पांच वर्ष की आयु से ही शुरू हो गयी थी. और बाद में कलकत्ता तथा पंजाब विश्वविद्यालय से सन 1880 में  एंट्रेंस की परीक्षा एक वर्ष में उत्तीर्ण की उसके बाद आगे की पढाई के लिए लाहौर आ गए और यही उन्होंने गर्वमेंट कॉलेज में दाखिला लिया. सन 1882 में एफ. ए. की परीक्षा तथा मुख़्तारी की परीक्षा साथ-साथ दी और  उत्तीर्ण हुए.


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  • आर्य समाज के सदस्य :
    पढाई के दौरान ही वे आर्य समाज से काफी प्रभावित थे जिसके कारण उन्होंनेआर्य समाज की सदस्यता ली और सन 1882 के दौरान पहली बार आर्य समाज के लाहौर के वार्षिक उत्सव में सम्मिलित हुए.

    डी.ए.वी. कॉलेज की स्थापना :
    जब अजमेर में स्वामी दयानन्द का देहान्त 30 अक्टूबर, 1883 को हुआ तब उसके बाद 9 नवम्बर, 1883 को स्वामी दयानन्द के लिए एक शोक सभा का आयोजन किया गया लाहौर में आर्य समाज की ओर से और इस सभा के अंत में स्वामी जी की स्मृति में एक ऐसे महाविद्यालय की स्थापना का संकल्प लिया गया जिसमें वैदिक साहित्य, संस्कृति तथा हिन्दी की उच्च शिक्षा के साथ-साथ अंग्रेज़ी और पाश्चात्य ज्ञान-विज्ञान में भी छात्रों को शिक्षा में दक्षता प्राप्त कराई जाये. 

    इसी के साथ आर्य समाज के अन्य नेताओं के साथ लाला लाजपत राय के संचालन में सन 1886 में शिक्षण संस्थान "दयानन्द एंग्लो वैदिक कॉलेज" की स्थापना हुई.

    वकालत का कार्य  :
    मुख़्तारी की परीक्षा पास करने के बाद मुख़्तार (छोटा वकील) के रूप में अपने मूल निवास स्थल जगराँव में ही वकालत का कार्य शरू कर दिया. लेकिन छोटा क़स्बा होने के कारण अधिक काम आने की सम्भावना नहीं थी. 

    जिस कारण वो रोहतक चले गये और वही रह कर उन्होंने  सन 1885 में वकालत की परीक्षा को उत्तीर्ण किया. और उसके बाद एक सफल वकील बन कर  सन 1886 में वे हिसार चले आये. और उसके बाद उन्होंने वही रह कर सन 1892 तक वकालत की. और फिर सन 1886 में लाहौर चले आये उसी के बाद से लाहौर ही उनकी सार्वजनिक गतिविधियों का केन्द्र बन गया.

    आदर्श :
    लाजपत राय जी ने जब एक पुस्तक में मेत्सिनी के लिखे भाषण पढ़ा तब वे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने मेत्सिनी की जीवनी पढ़नी चाही लेकिन मेत्सिनी की पुस्तक भारत में नहीं मिली तब उन्होंने इस पुस्तक को इंग्लैण्ड से मंगवाया और इसे पढ़ा और इसे पढ़ कर उन्होंने अपने जीवन में  ज्यूसेपे मेत्सिनी को आदर्श के रूप में उन्हें मानने लगे थे.

    लाजपत राय जी ने ज्यूसेपे मेत्सिनी की लिखी पुस्तक ‘ड्यूटीज ऑफ़ मैन’ का उर्दू में अनुवाद किया और फिर उसको पढ़ने के लिए लाहौर के एक पत्रकार को दिया लेकिन उस पत्रकार ने इसमे थोडा सा संशोधन करके अपने नाम से प्रकाशित करवा दी.

    कांग्रेस की सदस्यता :
    जब वे हिसार में वकालत कर रहे थे तब ही उन्होंने  कांग्रेस की सदस्यता ले ली थी. और  कांग्रेस की की बैठकों में जाया करते थे. और इसी के साथ वो धीरे-धीरे के कांग्रेस के सक्रिय कार्यकर्ताओं में उनका भी नाम हो गया.

    नगर निगम सदस्य :
    उनके हृदय में देश के प्रति  राष्ट्रीय भावना भी बचपन से ही थी. लाला जी  लोकमान्य तिलक तथा विपिनचन्द्र पाल के साथ मिलकर कांग्रेस कांग्रेस में शामिल हुए. मात्र 23 वर्ष की आयु में सन 1888 में कांग्रेस के 'प्रयाग सम्मेलन' में शामिल हुए थे. कांग्रेस द्वारा आयोजित "लाहौर अधिवेशन" को सफल बनाने के लिए लालाजी ने जी जान से प्रयास किया और "लाहौर अधिवेशन" को सफल बनाया. और उसके बाद "हिसार नगर निगम" सदस्य बने और बाद में उनको सचिव भी बनाया गया.

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  • ब्रिटिश युवराज का आगमन :
     जब भारत में ब्रिटिश युवराज के आगमन पर एक समारोह के दौरान उनका स्वागत करना था और इसका प्रस्ताव आया तो लालाजी ने इसका  विरोध किया और कांग्रेस के मंच से सभी को संबोधित करते हुए तेजस्वी भाषण दिया जिसमें देश की अस्मिता प्रकट हुई थी.

    किसानों का अधिकार :
    पंजाब के किसानों को अपने अधिकार को लेकर उन्हें जागरूक किया और सन 1907 में जब किसान अपने हकों को लेकर जागरूक होने लगे तब अंग्रेजी सरकार लालाजी तथा सरदार अजीतसिंह पर कोर्धित हुए और सरकार ने उन दोनों देशभक्त नेताओं देश से निकल दिया और उन्हें पड़ोसी देश बर्मा के मांडले नगर में नज़रबंद कर दिया. 
    लेकिन देश की जनता सरकार के इस दमनपूर्ण काम का जबरजस्त विरोध किया जिसके कारण   लालाजी तथा सरदार अजीतसिंह को वापस देश में लाया गया. भारत की जनता ने दोनों देशभक्तों का जोरदार स्वागत किया.

    देशव्यापी अकाल :
    देश में सन 1897 और सन 1899 के बीच जबरजस्त  देशव्यापी अकाल पड़ गया. जिससे कारण हर तरफ भुखमरी, बीमारी का साम्राज्य फ़ैलाने लगा. इस देशव्यापी अकाल में लाजपत राय पीड़ितों की सेवा में जी जान से जुटे रहे. राहत कार्यों में सबसे आगे आगे रहते इसी के दूसरी तरफ ब्रिटिश सरकार देश में आये भूकंप और अकाल में देशवासियों की सहायता की जगह आराम से बैठे रहे.

    बंगाल विभाजन का विरोध :
    अंग्रेजो ने  देश को बाटने का षड्यंत्र रचा और  सन 1905 में बंगाल का विभाजन कर दिया. इस बटवारे को लेकर लालाजी ने सुरेंद्रनाथ बनर्जी और विपिनचंद्र पाल जैसे आंदोलनकारियों के साथ मिल कर ब्रिटिश सरकार के तानाशाही फैसले का खुलकर विरोध किया.

    रावलपिंडी में गिरफ़्तार :
    अंग्रेजों के विरुद्ध देश की आज़ादी के लिए लगातार संघर्ष करते रहे और एक दिन  3 मई, 1907 को लालाजी को रावलपिंडी से अंग्रेज़ों ने गिरफ्तार कर लिया.

    इंग्लैंड गए : भारत की स्थिति में सुधार लाने के उदेश्य से लालाजी कई बार इंग्लैंड का दौरा किया अंग्रेज़ों से विचार-विमर्श किया देश की स्थिति से उन सभी को अवगत कराया.

    जब कई देश प्रथम विश्वयुद्ध की आग में जल रहा था तब सन 1914 से लेकर सन 1918 के दौरान पुनः एक प्रतिनिधि मण्डल के सदस्य के रूप में इंग्लैंड गये और वहा जा कर भारत की स्वतंत्रता को लेकर लोगो के बीच प्रबल जनमत जागृत किया.

    इण्डियन होमरूल लीग की स्थापना :
    इंग्लैंड के बाद वो जापान गए फिर  यही से होते हुए अमरीका पहुंचे जहा  स्वाधीनता-प्रेमी  अमरीकावासियों के समक्ष भारत की स्वाधीनता के पक्ष में आपनी बातो को प्रबलता से रखा और वही पर  "इण्डियन होमरूल लीग" नाम से एक संगठन का स्थापना किये.

    तरुण भारत का लेखन :
    और इसी दौरान उन्होंने  कुछ किताबे भी लिखी. और उसके बाद "तरुण भारत" के नाम से एक पुस्तक लिखी यह पुस्तक देशप्रेम तथा नवजागृति पर आधारित थी जिसके कारण ब्रिटिश हुकूमत ने इस किताब पर प्रतिबन्ध लगा दिया.

    मासिक पत्र : 
    लेकिन हार ना मानने वाले लाला लाजपत राय जी ने मासिक पत्र निकाला "यंग इंण्डिया" के नाम से और इसी बीच उन्होंने कई पुस्तके लिखी. दुसरे देश में रहते हुए भी देशहित के लिए काम करते रहे. वहा रहते हुए जागरूकता और स्वतंत्रता के उदेश्य को लेकर .उन्होंने दो संस्थाएं चलायी सक्रीय रूप से "इंडियन इन्फ़ॉर्मेशन" और "इंडियन होमरूल" के नाम से.

    जलियाँवाला बाग़ :
    जब लाला लाजपत राय वापस 20 फ़रवरी, 1920 को भारत वापसी हुयी तब अमृतसर में ' जलियांवाला बाग़ काण्ड   हो चूका था उन्होंने देखा पंजाब ही पूरा देश राजनैतिक रूप से जल रहा था. यह घटना देशवासियों के सीने में अंग्रेजो के खिलाफ़ ज्वाला बन कर सुलग रही थी .

    असहयोग आन्दोलन :
    स्वराज की माँग को लेकर गांधी जी ने 1 अगस्त, 1920 को असहयोग आन्दोलन की शुरुआत की और इस आन्दोलन में लालाजी ने भी भाग लिया. और सक्रीय रूप  से इसमे अपना भरपूर योगदान दिया. उन्होंने पंजाब में सन 1920 में असहयोग आन्दोलन का नेतृत्व किया, और इसी कारण एक बार फिर से सन 1921 में  गिरफ्तार हुए और उन्हें कारावास की सजा सुनाई गयी.

    पंजाब केसरी की उपाधि :
    "लोक सेवक संघ" के नाम से लालाजी ने एक संगठन की स्थापना की और इसमे लोगो को जोड़ा और अपने अन्य आन्दोलनों  में गति दी जिसके कारण वो पंजाब के लोगो के बीच और प्रसिद्ध हो गए उन्हें लोग "पंजाब का शेर" और "पंजाब केसरी" के नाम से पुकारने लगी 

    साइमन कमीशन :

    1927 जब "साइमन कमीशन" का गठन हुआ तब इस आयोग का तीव्र विरोध किया गया. और यह विरोध जंगल में लगी आग की तरह फ़ैलने लगी लोगो के बीच. जगह जगह पर अंग्रेजों के खिलाफ़ धरने प्रदर्शन होने लगे

    आखिरी सफ़र :
     इसी दौरान लाहौर में 30 अक्टूबर, 1928 को  साइमन कमीशन के विरोध में  लाला लाजपत राय के नेतृत्व में लोगो ने धरना प्रदर्शन शुरू कर दिया इस प्रदर्शन से क्रोधित अंग्रेजो ने बेरहमी के साथ भीड़ पर लाठियां चलानी शुरू कर दी और लोगो को पीटना शुरू कर दिया. चारो तरफ बस अंग्रेजों की लाठियाँ ही लाठियाँ नज़र आने लगी और इसी लाठी चार्ज में लाजपत राय की छाती पर बेहरमी के साथ लाठियों से वार किया गया जिसके कारण लालाजी बुरी तरह से घायल हो गए

    निधन : और इसके बाद उन्हें अस्पताल में भारती कराया गया और तब लालाजी ने अपना अंतिम भाषण दिया कि.
    मेरे शरीर पर पड़ी एक-एक चोट ब्रिटिश साम्राज्य के क़फन की कील बनेगी
    17वें दिन अस्पताल में इजाज के दौरान 17 नवम्बर, 1928 को उनका निधन हो गया और इसी के साथ देश के लाल पंजाब केशरी ने अपनी आंखे सदा सदा के लिए मूँद ली. और देश के लिए शहीद हो गए.
    श्रद्धांजलि : लाला जी को महात्मा गाँधी ने श्रद्धांजलि देते हुए कहा  कि
    "भारत के आकाश पर जब तक सूर्य का प्रकाश रहेगा, लालाजी जैसे व्यक्तियों की मृत्यु नहीं होगी. वे "अमर रहेंगे."

    बदला :
    लाला लाजपत राय जी की मौत के  ज़िम्मेदार अंग्रेज़ अफ़सर को मौत के घाट उतारने का संकल्प चंद्रशेखर आज़ाद, भगत सिंह और राज गुरु ने लिया. और उसी की बाद लाला लाजपत राय जी निधन के लिए ज़िम्मेदार अंग्रेज़ अफ़सर स्कॉट को मौत के घाट उतारने के लिए एक योजना बनायीं गयी.

    चंद्रशेखर आज़ाद, भगत सिंह और राज गुरु ने मिलकर जे. पी. सांडर्स सहित एक अन्य अंग्रेज़ अफ़सर को भी मारा डाला. जिसने स्कॉट के कहने पर लाला लाजपत राय पर लाठियाँ चलायी थीं.

    दोस्तों अगर लाला लाजपत राय की जीवनी – Lala Lajpat Rai Biography In Hindi के इस लेख को  लिखने में मुझ से कोई त्रुटी हुयी हो तो छमा कीजियेगा और इसके सुधार के लिए हमारा सहयोग कीजियेगा. आशा करता हु कि आप सभी को  यह लेख पसंद आया होगा. 

    धन्यवाद आप सभी मित्रों का जो आपने अपना कीमती समय इस Wahh Blog को दिया.



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