Tuesday, 11 July 2017

जाने सोमनाथ मंदिर के महत्व और इतिहास को - Somnath Mahadev Temple - History

जाने प्रथम ज्योतिर्लिंग सोमनाथ मंदिर के प्राचीन महत्त्व और इतिहास को Somnath Mahadev Temple - History 

दोस्तों सावन के महापर्व के अवसर पर 12 ज्योतिर्लिंग के दर्शन करते हैं और साथ ही जानते हैं भगवान शिव के 12  ज्योतिर्लिंगों के महत्त्व, दर्शन, इतिहास और भारत में कहा कहा स्थित हैं. भगवान शिव के पवित्र 12 ज्योतिर्लिंग

आज के विशेष  पोस्ट की शुरुआत करते हैं "प्रथम ज्योतिर्लिंग" के रूप में स्थापित सोमनाथ मंदिर की जिसे सोमनाथ ज्योतिर्लिंग कहा जाता है.

Somnath-Mahadev-Temple-Lord-Shiva

दोस्तों सम्पूर्ण भारत देश में अलग अलग स्थानों पर भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंग स्थित हैं. जिनमे से सोमनाथ ज्योतिर्लिंग को गणना के अनुसार प्रथम माना गया हैं. सोमनाथ मंदिर  गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र के वेरावल बंदरगाह नामक स्थान पर स्थित है. 

तो आईये अब जानते हैं इस मंदिर के पौराणिक महत्व और इतिहास तथा साथ ही भगवान शिव के प्रथम ज्योतिर्लिंग सोमनाथ मंदिर की यात्रा के बारे करे.

  • पौराणिक वर्णन

प्राचीन हिन्दू ग्रंथों के अनुसार राजा  दक्षप्रजापति के 27 कन्याएँ थी जिनका विवाह सोम अर्थात् चंद्रदेव (चन्द्रमा) से दक्षप्रजापति ने कराया. लेकिन इस विवाह के बाद चंद्रदेव का ह्रदय प्रेम अपनी 27 पत्नियों में से एक रोहिणी के प्रति ही ज्यादा था. इस कारण बाकी  26 राजा दक्षप्रजापति की पुत्रियाँ इस बात से रुष्ट (नाराज़) रहती थी. एक दिन इस बात को 27 पुत्रियों ने अपने पिता दक्षप्रजापति को बताई और अपनी यह पीड़ा उनके सामने ज़ाहिर की, तब वे  चंद्रदेव  से मिले उन्हें समझाया सब पत्नियां एक सामान होती हैं, सभी के लिए ह्रदय में प्रेम एक समान होना चाहिए. लेकिन उनकी यह बात चंद्रदेव को  समझ में नहीं आ रही थी और रोहणी के ही  प्रेम में खोये रहते और चंद्रदेव ने  दक्षप्रजापति की बात नहीं मानी, और चंद्रदेव का प्रेम रोहणी के साथ ही रहा इसे देख राजा दक्षप्रजापति क्रोधित हो उठे अंततः वो  चंद्रदेव को क्षय रोग होने का श्राप दे डाला की जाओ आज से चेहरे का तेज़ कम हो जाएगा. श्राप के कारण चंद्रदेव तत्काल क्षय रोग से ग्रस्त हो गए. पृथ्वी पर रात्रि के समय अपनी शीतलता की वर्षा ना कर पाने से  पृथ्वी पर त्राहि-त्राहि मच गया. क्षय रोग से ग्रस्त चंद्रदेव बहुत दुखी और चिंतित थे कैसे  इस श्राप से मुक्ति पाए 


जाने सोमनाथ मंदिर के महत्व और इतिहास को

श्राप से मुक्ति से मुक्ति पाने के लिए पितामह ब्रह्माजी जी के पास गए देवराज इंद्र, ऋषि वशिष्ठ तथा अन्य ऋषि मुनियों के साथ और श्राप से उबरने के लिए ब्रह्मा जी से प्रार्थना की, चंद्रदेव की सारी बातो को जानकार  ब्रह्मा जी ने कहा इस श्राप से मुक्ति का केवल एक ही मार्ग ही किसी पवित्र स्थान पर जाकर, देवो के देव महामृत्युंजय भगवान शिव की आराधना करो और वही इसका निवारण कर सकते हैं और इस श्राप से मुक्ति दिला सकते हैं.  

पितामह ब्रह्माजी जी की बात सुन कर चंद्रदेव (चंद्रमा) महामृत्युंजय भगवान शिव की आराधना के लिए एक पवित्र स्थान पर जाकर घोर तपस्या में लीन हो गए और दस करोड़ बार मृत्युंजय मंत्र का जप किया.  इस तपस्या को देख भगवान शिव ने चंद्रदेव को अमरत्व का वरदान दिया साथ ही कहा चंद्रदेव तुम चिंतित ना हो मेरे इस वरदान से तुम्हे श्राप से मुक्ति तो मिलेगी ही साथ में  प्रजापति दक्ष के वचनों की रक्षा भी होगी. 

कृष्णपक्ष में प्रत्येक दिन तुममे तेज़ धीरे-धीरे कम होने लगेगा, लेकिन शुक्ल पक्ष में उसी तरह तेज़ की प्राप्ति होगी और इस तरह प्रत्येक पूर्णिमा को तुम्हें पूर्ण चंद्रत्व की प्राप्ति होगी. इस वरदान के मिलते ही चंद्रदेव (चंद्रमा) के साथ साथ संसार  के प्राणी प्रसन्न हो उठे. 


इस श्राप मुक्ति के बाद चंद्रदेव सहित अन्य सभी  देवताओं ने एक साथ मिलकर देवो के देव महामृत्युंजय भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना की और प्रार्थना की कहा आप सदा हम सब प्राणियों की रक्षा एवं कल्याण हेतु आप यहाँ निवास करे तब इस प्रार्थना की स्वीकार करते हुए प्रथम ज्योतर्लिंग के रूप में माता पार्वती जी के साथ स्वयं महामृत्युंजय भगवान शिव  निवास करने लगे . जिसे हम भगवान सोमनाथ के  नाम से जानते हैं जो विश्वप्रसिद्ध हैं. 

सोमनाथ-ज्योतिर्लिंग की महिमा का वर्णन महाभारत, श्रीमद्भागवत तथा स्कन्दपुराणादि में विस्तार से बताया गया हैं. और साथ ही इसका उल्लेख ऋग्वेद में भी मिलता है..

  • शिव महापुराण के कोटिरुद्र संहिता के चौदहवें अध्याय में लिखा है

विमले च कुले त्वं हि समुत्पन्नः कलानिधे।
आश्रितेषु च सर्वेषु न्यूनाधिक्यं कथं तव।।

कृतं चेतत्कृतं तच्च् न कर्त्तव्यं त्वया पुनः।
वर्तनं विषमत्वेन नरकप्रदमीरितम्।।

श्रयतां चन्द्र यत्पूर्व प्रार्थितो बहुधा मया।
न मानितं त्वया यस्मात्तस्मात्त्वं च क्षयी भव।।
  • धार्मिक मान्यता
भगवान सोमनाथ की पूजा दर्शन एवं उपासना से भक्तो को क्षय तथा कोढ़ आदि रोगों से मुक्ति मिल जाती जाती और वो पूर्णत स्वस्थ हो जाता है. क्युकी इस सोमेश्वर भगवान शिव साक्षात् यहाँ विराजमान हैं. ज्योतिर्लिंग के रूप में.  यशस्वी चन्द्रमा और सभी देवताओं  ने मिलकर सोमकुण्ड  की स्थापना की और इस कुण्ड में स्वयं भगवान शिव और ब्रह्मा जी निवास करते हैं. जो मनुष्य इस  चन्द्रकुण्ड में स्नान करता हैं उसके सभी पापो का नाश हो जाता हैं और अपने द्वारा किये गए पापो से मुक्ति पाता  हैं.  साथ ही इस कुण्ड  रोजाना छः माह तक बिना नागा स्नान करने से  क्षय आदि दुःसाध्य और असाध्य रोगों से मुक्त मिल जाती हैं और वह स्वस्थ हो जाता हैं. शिव महापुराण की कोटिरुद्र संहिता के चौदहवें अध्याय में उपर्युक्त आशय वर्णित है.



चन्द्रकुण्डं प्रसिद्ध च पृथिव्यां पापनाशनम्।
तत्र स्नाति नरो यः स सर्वेः पापैः प्रमुच्यते।।

रोगाः सर्वे क्षयाद्याश्च ह्वासाध्या ये भवन्ति वै।
ते सर्वे च क्षयं यान्ति षण्मासं स्नानमात्रतः।।

प्रभासं च परिक्रम्य पृथिवीक्रमसं भवम्।
फलं प्राप्नोति शुद्धात्मा मृतः स्वर्गे महीयते।।

सोमलिंग नरो दृष्टा सर्वपापात्प्रमुच्यते ।
लब्धवा फलं मनोभीष्टं मृतः स्वर्गं समीहते।।

SOMNATH-TEMPLE-GUJARAT
सोमनाथ मंदिर

Somnath Mahadev Temple - History

  • सोमनाथ मन्दिर इतिहास

सोमनाथ मन्दिर का इतिहास काफी प्राचीन हैं. इस मंदिर का अस्तित्व कई ईसा पूर्व का है. मंदिर का पुनर्निर्माण दूसरी बार सातवीं सदी में  वल्लभी के मैत्रक राजाओं ने किया था. आठवीं सदी में इसे पुनः सिन्ध के अरबी गवर्नर जुनायद ने अपनी  सेना को यहाँ भेज कर नष्ट कर दिया.  तीसरी बार इस मंदिर का पुनः निर्माण 815 ईस्वी में प्रतिहार राजा नागभट्ट ने कराया. इस पवित्र मंदिर की कीर्ति दूर-दूर तक फ़ैलने लगी जिसका जिक्र अरब यात्री अल-बरुनी ने अपने यात्रा वृतान्त में किया और इस मंदिर के बारे 


में जानकारी मिलते ही महमूद ग़ज़नवी  ने सन 1024 में अपनी सेना के साथ हमला बोल दिया और मन्दिर में चढ़े सारे सोने-चाँदी  और हीरे-जवाहरातों को लूट लिया साथ ही मंदिर के अन्दर हज़ारो की संख्या में रहे भक्तो को मौत के घाट उतार दिया. मंदिर को तहस-नहस कर दिया. उसके बाद वो लूटी गयी सम्पत्ति के साथ  अपने देश ग़ज़नी चला गया. आज भी सोमनाथ मन्दिर का भग्नावशेष  समुद्र के किनारे विद्यमान है. 


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1969 सोमनाथ मंदिर 

इतिहासकारो के अनुसार बताया जाता हैं की जब महमूद ग़ज़नवी सोमनाथ के शिवलिंग को खंडित (तोड़) ना सका तो वह गुस्से में शिवलिंग के चारो तरफ आग लगवा दी थी. और मंदिर में ही स्थित नीलमणि के छप्पन खम्भों में जडित हीरे-मोती तथा विविध प्रकार के रत्न को लूट लिया और मंदिर को नष्ट कर दिया. 
  • पुन: मंदिर का निर्माण 

महमूद ग़ज़नवी के आक्रमण से खंडित मंदिर का पुन: प्रतिष्ठा (निर्माण)  राजा भीमदेव ने कराया. और इस मंदिर की  प्रतिष्ठा पवित्रीकरण के लिए सन् 1093 में सिद्धराज जयसिंह अपना पूर्णत सहयोग दिया. जब सोमनाथ की यात्रा की सन् 1168 में विजयेश्वर कुमारपाल ने जैनाचार्य हेमचन्द्र सरि के साथ तब इस मंदिर का सुन्दरीकरण कराया.  और इसके बाद सौराष्ट्र के राजा खंगार ने भी मंदिर के सुन्दरीकरण अपना भरपूर  योगदान दिया.

  • मंदिर को मुस्लिम शासकों द्वारा लगातार नष्ट किया गया 
लेकिन मंदिर को नष्ट करने का कार्य रुका नहीं बार-बार मुस्लिम शासक इस मंदिर पर आक्रमण कर इसे नष्ट करते रहे. सन् 1297 ई में अलाऊद्दीन ख़िलजी ने  सोमनाथ-मन्दिर पर आक्रमण कर इसे नष्ट किया. और ख़िलजी के सेनापति रहे नुसरत ख़ाँ ने यहाँ की सम्पत्ति को लूटा. लेकिन यह सिलसिला रुका नहीं  गुजरात का सुल्तान मुजफ्फरशाह भी सन् 1395 ई. में इस मंदिर को लूटा और इसे नष्ट किया. इसी तरह सन् 1413 ई. में अहमदशाह ने आक्रमण कर यहाँ तबाही मचाई और तहस नहस किया.  

 Somnath Mahadev Temple - History

  • देश की आज़ादी के बाद 

भारतीय स्वतन्त्रता के बाद पुनः सोमनाथ मन्दिर का भव्य निर्माण भारत के प्रथम राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद द्वारा मंदिर में ज्योतिर्लिग स्थापित कर कराया गया. और प्रथम ज्योतिर्लिग के रूप में सोमनाथ मंदिर 1962 पूर्ण रूप से निर्मित हो गया. जामनगर की राजमाता ने 1970 में अपने स्वर्गीय पति की स्मृति में दिग्विजय द्वार का भव्य निर्माण कराया. इसी द्वार के करीब राजमार्ग है. भारत के पूर्व गृहमन्त्री सरदार बल्लभ भाई पटेल की एक प्रतिमा भी यही लगी हैं क्युकी इनका बहुत बड़ा योगदान रहा इस  सोमनाथ मंदिर के पुनः निर्माण में.. 


अब सोमनाथ मंदिर की व्यवस्था और संचालन का कार्य सोमनाथ ट्रस्ट द्वारा देखा जाता हैं. यह तीर्थ स्थल चैत्र, भाद्र, कार्तिक माह में पितृगणों के श्राद्ध का विशेष महत्त्व रखता है. और नारायण बलि के लिए भी प्रसिद्ध हैं. यहाँ त्रिवेणी स्नान का भी विशेष महत्व है. क्युकी यहाँ तीन नदियों का महासंगम होता हैं हिरण, कपिला और सरस्वती का इस तीनो नदियों की धारा यहाँ मिलती हैं. हां चैत्र, भाद्र, कार्तिक माह में  श्रद्धालुओं की भरी भीड़ रहती है.
  •  सोमनाथ मंदिर कैसे पहुँचें  

प्रथम ज्योतिर्लिंग सोमनाथ मन्दिर  गुजरात के वेरावल में स्थित हैं यह स्थान कई नामो से जाना जाता हैं. जैसे वेरावल, सोमनाथपाटण, प्रभास और प्रभासपाटण आदि.. "सोमनाथ मंदिर"  का सबसे नज़दीकी रेलवे स्टेशन वेरावल में है और यह स्टेशन कोंकण लाइन पर पड़ता है जोकि मंदिर से मात्र पांच किलोमीटर की दुरी पर हैं.. और वेरावल रेल मार्ग  मुंबई से जुड़ा हुआ है. 



  • निकटतम रेलवे स्टेशन - वेरावल
  • निकटतम हवाई अड्डा -दीव, राजकोट, अहमदाबाद, वड़ोदरा



यह विडिओ क्लिप यू टूयूब के News On Trends चैनल से लिया गया हैं.. 

दोस्तों  "12  ज्योतिर्लिंग दर्शन" नाम के  इस आर्टिकल में  प्रथम  ज्योतिर्लिंग सोमनाथ मन्दिर के दर्शन, महत्व और इतिहास से जुड़े इस लेख को लिखने में मुझसे जो भी त्रुटी हुयी हो उसे छमा करे  और हमारा इस विषय में सहयोग दे ताकि मैं अपनी गलतियों को सुधार  सकू. 
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