Friday, 27 April 2018

दादा साहब फाल्के की जीवनी - Birthday 30 April Dadasaheb Phalke

दादा साहब फाल्के की जीवनी - Dadasaheb Phalke Biography In Hindi


दोस्तों आज के आर्टिकल (Biography) में जानते हैं,  भारतीय फ़िल्म उद्योग के पितामह  “दादा साहब फाल्के साहब  का जीवन परिचय” ( Dadasaheb Phalke Biography In Hindi) के बारे में. और जानेंगे दादा साहब फाल्के के फ़िल्मी इतिहास को.

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दादा साहब फाल्के की जीवनी -  Birthday 30 April  

एक झलक Dadasaheb Phalke की जीवनी पर :
दादा साहब फाल्के का जन्म नासिक के निकट "त्र्यंबकेश्वर" में  30 अप्रैल, 1870 को हुआ था.  इनका असली नाम धुन्दीराज गोविंद फाल्के था. दादा साहब के पिता जी संस्कृत के एक जानेमाने  प्रकाण्ड पंडित थे और मुम्बई के 'एलफिंस्टन कॉलेज' के अध्यापक थे.


शिक्षा :
दादा साहब की शिक्षा मुम्बई से हुयी और उन्होंने हाई स्कूल करने के बाद कला की शिक्षा प्राप्त करने के लिए जे.जे. स्कूल ऑफ़ आर्ट' स्कूल में दाखिला लिया और यहाँ से शिक्षा पूर्ण करने के बाद बड़ौदा में स्थित  कलाभवन में रहकर कला के क्षेत्र में  ज्ञान को बढ़ाया.
कार्यक्षेत्र:
Dadasaheb Phalke ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग में भी कार्य किया और उसके बाद उन्होंने जर्मनी से मशीन ला कर अपना एक प्रिटिंग प्रेस भी लगाया.  और एक मासिक पत्रिका का प्रकाशन भी किया. 

फिल्मो की ओर:
दादा साहब का  शुरू से ही कला  के क्षेत्र में रुझान रहा लेकिन जब 1911 में  ईसा मसीह के जीवन पर आधारित फिल्म को देखा तो उनका मन फिल्मो की तरफ आकर्षित हो गया उस दौरान फिल्मे मूक आती थी जिसमे कोई आवाज़ नहीं होती थी बस चेहरे के भाव और अपने अभिनय से दर्शको को अपनी ओर खीच लेती थी फिल्मे.

दादा साहब The Life of Christ ईसा मसीह की फिल्म से इतने प्रभावित हुए की सोचने लगे क्यों ना अपने देश के महापुरुषों और देवी देवताओं के ऊपर फिल्म बनायीं जाए. और यही सोच उनकी फिल्मों की ओर ले आई.

फिल्मों की शिक्षा:
अपने इस सपने को पूरा करने का निश्चय कर लिया लेकिन उनके सामने सब बड़ी दिक्कत पैसो की थी. तब उन्होंने पैसो का इंतजाम थोडा बहुत उधर और चंदा लिया  और फिल्म की बारीकी सिखने के लिए लंदन चले गए और वह लगभग दो महीने रह कर सिनेमा की तकनीक को सीखा और उसी दौरान उनकी मुलाकात जाने-माने निर्माता और ‘बाईस्कोप’ पत्रिका के सम्पादक सेसिल हेपवोर्थ से हुई, जिनकी मदद से फ़िल्म निर्माण से जुडी चीजो को ख़रीदा और उसे  लेकर वापस भारत आ गए.

फिल्म कम्पनी की स्थापना:
भारत आने के बाद फिल्मों में काम करने के लिए उत्साहित कुछ लोगो को लेकर दादर (मुम्बई) में 1912 को फाल्के फ़िल्म कम्पनी की स्थापना की. 
पहली फिल्म:
सबसे पहली उन्होंने  अपने निर्देशन में  फिल्म बनायीं राजा हरिश्चन्द्र और इस पहली फिल्म के लिए फोटोग्राफी, फिल्मो के सेट निर्माण को भी  सीखा और उसके बाद रंगमंच की सारी कलाओं को इसमे मिलाया और बना दी अपनी पहली फिल्म.


जिसे 3 मई 1913 को बंबई के "कोरोनेशन थिएटर" में अपनी पहली मूक फिल्म “राजा हरिश्चन्द्र” को दर्शकों के बीच दिखाया जिसे दर्शको ने काफी सराहा.

दादा साहब फाल्के की जीवनी - Dadasaheb Phalke Biography In Hindi

महिला अभिनेत्री:
1913 में बनाए जाने वाली फ़िल्म "भस्मासुर मोहिनी" में पहली बार किसी महिला ने अभिनेत्री  का रोल किया क्युकि उस समय महिलाओं का रोल पुरुष ही किया करते थे.   

दुर्गा गोखले और कमला गोखले, ने "भस्मासुर मोहिनी" में  फिल्म जगत में महिला किरदार के रोल को निभाया.

हिन्दुस्तान सिनेमा कम्पनी की स्थापना:
 1913 से फ़िल्मी सफ़र उनका इतना सफल रहा की उन्होंने 1917 तक  23 फिल्मों का निर्माण कर लिया जो दर्शको के बीच काफी लोकप्रिय हुई. 

फिल्मों की बढती लोकप्रियता को देखते हुए कुछ व्यवसायी फिल्म निर्माण को व्यापार के रूप में देखने लगे और इस उद्योग की ओर आकर्षित होने लगे. तब दादा साहब फाल्के के साथ मिलकर कुछ लोगो ने हिन्दुस्तान सिनेमा कम्पनी की स्थापना की.

अंतिम मूक फ़िल्म:
Dadasaheb Phalke की फ़िल्म "सेतुबंधन" जो अंतिम मूक फिल्म थी. जिसे बाद में  डब करके आवाज़ दी गई उस दौरान फिल्मो में आवाज़ को डब करना बहुत ही मुश्किल भरा करा काम था. 

बोलती पहली फ़िल्म:
फ़िल्म "गंगावतरण" पहली और उनकी एक मात्र फिल्म थी जिसे आवाज़ के साथ बनाया गया था.

यादगार फिल्मे:
25 वर्षों के फ़िल्मी सफ़र में दादा साहब ने 1913 से लेकर 1923 तक ढेरो फिल्मो का निर्माण किया. जिसमे से कुछ यादगार फिल्मे इस प्रकार हैं.
  • राजा हरिश्चंद्र (1913)
  • मोहिनी भस्मासुर (1913)
  • सावित्री सत्यवान (1914)
  • लंका दहन (1917)
  • श्री कृष्ण जन्म (1918)
  • कालिया मर्दन (1919)
  • कंस वध (1920)
  • शकुंतला (1920)
  • संत तुकाराम (1921)
  • भक्त गोरा (1923)
  • सेतु बंधन (1932)
  • गंगावतरण (1937) पहली और एकमात्र बोलती फिल्म 


उन्होंने अपने समय में 125 फ़िल्मों का निर्माण किया था. और इनमें से कई  फिल्मों में खुद स्टोरी लिखी और उसे  निर्देशित किया था.

सम्मान और पुरस्कार:
वर्ष 1969 में फाल्के शताब्दी के उपलक्ष्य में भारतीय सिनेमा ने Dada Saheb के फिल्मो के प्रति सबसे बड़े योगदान को लेकर उनके सम्मान में "दादा साहब फाल्के सम्मान" अवार्ड की शुरुआत की गयी.

दादा साहब फाल्के की जीवनी - Dadasaheb Phalke Biography In Hindi

जिसे राष्ट्रीय स्तर का यह सर्वोच्च सिने पुरस्कार के रूप में दिया जाता हैं उन प्रतिभाशाली कलाकारों को जिनका प्रदर्शन काबिले तारीफ होता हैं यह पुरस्कार उनकी स्मृति में प्रतिवर्ष दिया जाता है.


अन्तिम सफ़र:
आखिरकार वो समय भी आ गया जब दादा साहब हम सभी को छोड़ कर दुनिया से दूर चले गए उनका निधन नासिक में  16 फ़रवरी, 1944 को हुआ था. आज भी पूरा फ़िल्मी जगत उन्हें भूल नहीं पाया हैं.

दादा साहब फाल्के की जीवनी से जुडी कुछ रोचक बाते:

@= दादा साहब के कुल  9 बच्चे थे. 

@= दादर (मुम्बई) में 1912 को फाल्के फ़िल्म कम्पनी की स्थापना की. 

@= 1913 में बनी  “राजा हरिश्चन्द्र” उनकी पहली फिल्म थी. जिसे निर्देशन उन्होंने ही किया 

@= उन्होंने 20 वर्षों में  कुल 95 फ़िल्में और 26 लघु फ़िल्में का निर्माण किया.

@= पहली बार फिल्म "भस्मासुर मोहिनी" में दुर्गा गोखले और कमला गोखले, ने महिला किरदार को निभाया.

@=  अपनी फ़िल्में उन्होंने ने बंबई के बजाय नासिक में बनाई. 

@= दादा साहब की अंतिम मूक फ़िल्म  'सेतुबंधन' थी जो सन 1932 में आई  जिसे बाद में डब करके आवाज़ दी गई.

@=  दादा साहब की साझेदारी में ‘हिन्दुस्तान सिनेमा कम्पनी’ की स्थापना हुई.

@= दादा साहब ने जो एकमात्र बोलती फ़िल्म बनाई उसका नाम 'गंगावतरण' था.

@= 1930 में उन्होंने फिल्म निर्माण का कार्य छोड़ दिया 

@= पौराणिक फिल्म के चमत्कारपूर्ण दृश्यों को दिखाने के लिए फिल्मो की विषयवस्तु और ट्रिक फोटोग्राफी में काफी नये परिवर्तन किये.

दोस्तों अगर दादा साहब फाल्के की जीवनी - Dadasaheb Phalke Biography  In Hindi के इस लेख को  लिखने में मुझ से कोई त्रुटी हुयी हो तो छमा कीजियेगा और इसके सुधार के लिए हमारा सहयोग कीजियेगा. आशा करता हु कि आप सभी को  यह लेख पसंद आया होगा. 


धन्यवाद आप सभी मित्रों का जो आपने अपना कीमती समय इस Wahh Blog को दिया.-

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