Friday, 14 July 2017

जाने श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की महिमा स्थापना सी जुडी कथा - Mahakal Ujjain History in Hindi


दोस्तों सावन के महापर्व के अवसर पर "12 ज्योतिर्लिंग के दर्शन" करते हैं और साथ ही जानते हैं भगवान शिव के 12  ज्योतिर्लिंगों के महत्त्व, दर्शन, और इतिहास के बारे में और साथ ही जानते है भगवान शिव के पवित्र 12 ज्योतिर्लिंग भारत में कहा कहा स्थित हैं. आज के इस आर्टिकल में जानते हैं श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की महिमा और स्थापना सी जुडी कथा को. "Mahakal Ujjain History in Hindi" 
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Mahakal Ujjain History in Hindi 

जाने श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की महिमा और स्थापना सी जुडी कथा 

मध्यप्रदेश के उज्जैन शहर में स्थित श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग जोकि रूद्र सागर सरोवर के किनारे पर बसा हुआ है. उज्जैन का उल्लेख  'उज्जयिनी' तथा 'अवन्तिकापुरी' के नाम से हमारे पुराणों और प्राचीन अन्य ग्रन्थों में किया गया है. कहा जाता हैं की स्वयं भगवान शिव महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग में स्वयंभू के रूप में विराजमान हैं, और यह सबसे पवित्र स्थान माना जाता है.  महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन से मनुष्य सभी रोग दोष से मुक्त हो जाता हैं. महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग में अपार शक्तियाँ है. और इसे पवित्र मंत्र-शक्तियों द्वारा पुरे विधि-विधान  से ही इस शिव लिंग की स्थापना की गयी थी. अवन्तीपुरी की गणना सात मोक्षदायिनी पुरियों में की गई है.
योध्या मथुरा माया काशी कांची ह्यवन्तिकापुरी द्वारावती चैव सप्तैता मोक्षदायिकाः।।
दोस्तों आईये जानते हैं देवो के देव महादेव के 12 ज्योतिर्लिंग में से एक श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की महिमा, महत्त्व और इसके निर्माण से जुडी बातो को 

Mahakal Ujjain History in Hindi 

  • शिव महापुराण में वर्णित कथा
श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग का वर्णन शिव महापुराण में इस प्रकार से मिलता हैं की, यह स्थान एक प्रसिद्ध और अत्यन्त अवन्ति नाम की नगरी के नाम से जाना जाता था. जो समस्त मनुष्य के लिए  मोक्ष प्रदान करने वाली तथा लोक पावनी परम पुण्यदायिनी और कल्याण-कारिणी नगरी के नाम से विख्यात था. क्युकी यह नगरी देवो के देव महादेव को अत्यन्त प्रिय थी. 

इस नगरी में शुभ कर्मपरायण तथा सदा वेदों के स्वाध्याय में लगे रहने वाला ‘वेदप्रिय’ नाम का एक ब्रह्मण रहता था. यह शिव भक्त प्रतेक दिन अपने घर में अग्नि की स्थापना कर अग्निहोत्र करते और पार्थिव लिंग का निर्माण कर शास्त्र विधि, वैदिक मंत्रो  के द्वारा अनुष्ठान करते व भगवान शिव की अर्चना-वन्दना में लीन रहते थे. 

ब्रह्मण वेदप्रिय के चार पुत्र थे.  चारो पुत्र अपने माता-पिता की तरह  तेजस्वी और सद्गुणों के अनुरूप थे. उन चारो पुत्रो का नाम 'देवप्रिय', 'प्रियमेधा', 'संस्कृत' और 'सुवृत' था. 

सुर दूषण का आतंक 
ब्रह्मा जी से अजेयता का वरदान प्राप्त कर ‘दूषण’ नाम के असुर ने पवित्र रत्नमाल पर्वत पर  वेद तथा धर्म को मानने वाले  धर्मात्माओं पर आक्रमण कर दिया. और इस आतंक से चारो तरफ हाहाकार मच गया.  

वो यही नहीं रुका इसके बाद उस असुर ने अपनी असुरी सेना के साथ अवन्ति (उज्जैन) के उन पवित्र पर पहुंचा और वहा भी भगवान शिव की अर्चना-वन्दना में लीन रहने वाले ब्राहमणों पर चढ़ाई कर दी. अपनी राक्षसी सेना में से चार भयानक असुरों को अवन्ति (उज्जैन) को तहस नहस करने के कार्य में लगा दिया. वे राक्षस चारों दिशाओं में भयंकर उपद्रव मचाने लगे उन सभी शिव भक्त ब्राह्मणबन्धुओं को सताने लगे.  जिससे कारण उस नगरी के सभी निवासी और ब्राह्मण डर गए और इधर-उधर भागने लगे. 
लेकिन इसके बावजूद वे चारो शिव भक्त ब्राह्मण घबराए नहीं उन्हें विश्वास था अपने प्रभु महादेव पर. और वे चारो शिवभक्त भाइयों ने सभी को आश्वासन देते हुए कहा आप इन असुरों के अत्याचारों से घबराए नहीं. हम भक्तो के रक्षक महादेव पर आस्था रखे, वो इन असुरो का नाश कर हमें इस विपदा से स्वयं बचायेंगे. ये कहने के बाद वे चारो भाई एकांत स्थान पर जा कर देवो के देव महादेव की पूजा करने लगे और शिव की तपस्या में लीन हो गए. 

जैसे ही ब्रह्मा जी से अजेयता का वरदान प्राप्त कर ‘दूषण’ को यह सूचना मिली की चार ब्राह्मण पुत्र भगवान शिव की तपस्या कर रहे हैं. हमारे विरुद्ध तब वह अपनी राक्षसी सेना के साथ उस स्थल पर पहुंचा जहा ब्राह्मण वेदप्रिय के चारो पुत्र तपस्या में ध्यान मग्न थे. 

इसे देख क्रोधित ‘दूषण’ ने अपने असुरो से कहा इन चारो को बंदी बना लो और इन्हें मौत के घाट उतार दो लेकिन उन चारो भाईयो पर  ‘दूषण’ के बातो तनिक भी प्रभाव नहीं पड़ा और वे चारो वैसे ही  तपस्या में ध्यान मग्न रहे इसे देख दुष्ट दैत्य और क्रोधित हो गया और यह समझ गया की मेरी इन बातो का कोई प्रभाव नहीं पड़ा इन चारो पर. तब उसने निश्चय कर लिया उन्हें जान से मारने का. 

जैसे ही चारो शिव भक्तो को मारने के लिए असुर ने शस्त्र को उठाया.  वैसे ही चारो द्वारा पूजन के लिए स्थापित पार्थिव लिंग की जगह की धरती फटी और गड्डा सा हो गया उस स्थान पर. और उसमे से साक्षात्  भयंकर रूप में भगवान शिव प्रकट हुए. और ‘दूषण’ दैत्य सहित उसकी सेना को कहा अरे दुष्टों- तुझ जैसे अधर्मी असुरो को भस्म करने के लिए मैं ‘महाकाल’ रूप में प्रकट हुआ हूँ...जल्दी इन ब्राह्मणों के समीप से दूर भाग जाओ. अन्यथा तुम सब को भस्म कर दूंगा. महाकाल के क्रोधित रूप को देख कर कुछ भयभीत असुर तो वहा से भाग गए. और बची सेना सहित दुष्ट दूषण को भस्म कर डाला और इसी प्रकार महादेव महाकाल के रूप में प्रकट हुए और अवन्ति (उज्जैन) नगर के लोगो की रक्षा की और दुष्ट को नाश किया


Mahakaal-Temple-ujjain
Mahakaal Temple ujjain 

महाकालेश्वर उन चारो की भक्ति से प्रसन्न हो के बोले मै तुम सब पर प्रसन्न हु जो चाहे वर मांग लो, महाकाल महेश्वर को साक्षात् रूप में देख चारो ने हाथ जोड़ भक्ति भाव पूर्ण रूप में बोले  प्रभु आप हम सब की रक्षा एवं कल्याण के लिए यही बस जाये ताकि संसार की रक्षा हो, और आपके दर्शन मात्र से हम  सभी मनुष्यों का उद्धार हो. उन चारो ब्राह्माणों की यह बात सुन कर देवो के देव महादेव ने कहा मैं यहाँ सदैव महाकाल महेश्वर के रूप में भक्तों के कल्याण के लिए रहूँगा. और उसके बाद उसी गड्ढे में समां गए और उस गड्ढे के चारो ओर करीब तीन  किलोमीटर तक की भूमि लिंग रूपी भगवान शिव की स्थली बन गई.  और भगवान शिव ही महाकाल के रूप में इस पृथ्वी के जगत कल्याण हेतु विख्यात हुए.

और जो भी महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग का दर्शन करता हैं उसे किसी भी तरह का दुःख अथवा संकट नहीं आता और जो भी भक्त सच्चे ह्रदय से महाकाल की आराधना करता हैं, उसकी सभी मनोकामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं. और वह परलोक में मोक्षपद को प्राप्त करता है...
महाकालेश्वरो नाम शिवः ख्यातश्च भूतलेतं दुष्ट्वा न भवेत् स्वप्ने किंचिददुःखमपि द्विजाः।। 
यं यं काममपेदयैव तल्लिगं भजते तु यः तं तं काममवाप्नेति लभेन्मोक्षं परत्र च।।

ज्जयिनी नगरी चन्द्रसेन
किसी समय उज्जयिनी नगरी में शिवभक्त, शास्त्रों के ज्ञाता तथा जितेन्द्रिय चन्द्रसेन नामक एक राजा का राज्य था. उनके इस शिवभक्ति, ज्ञान और सरल स्वभाव से प्रभावित होके  शिव जी के मुख्य गण "मणिभद्र" जी राजा चन्द्रसेन के परम मित्र बन गये. और उन्होंने एक दिन राजा चन्द्रसेन को मित्र भेट में  "चिन्तामणि" नामक एक महामणि को दिया. वह महामणि कौस्तुभ मणि और सूर्य के समान तेज़ प्रकाशमान थी. उस मणि के दर्शन करने तथा उसके बारे में ध्यान लगाने व सुनने मात्र से ही सभी कुछ मंगल होता हो जाता था सुख की वर्षा प्रदान करती थी वो मणि.


Mahakal Ujjain History in Hindi 

इस अमूल्य पवित्र मणि को राजा चंद्रसेन अपने गले में धारण कर लिए. इस अमूल्य मणि की चर्चा दूर दूर तक के राज्यों में होने लगी, सभी के लिए यह मणि चर्चा का विषय बन गयी, और हर राजा इस मणि को प्राप्त करना चाहता था किसी भी सूरत में, लेकिन इतना आसान ना था इस मणि को राजा चंद्रसेन से प्राप्त करना. 

तब कई राज्यों के राजाओं ने एक जुट हो कर इस मणि को पाने के लिए युद्ध की तैयारी करने लगे और उसके बाद उन सभी राजाओं ने मणि को प्राप्त करने के लालच में अपनी सेना के साथ एक रणनीति बना कर  उज्जयिनी नगरी की तरफ अपने भारी सैन्यबल के साथ निकल पड़े और इस नगरी को चारो तरफ से घेरने लगे. 


जब इस युद्ध की जानकारी राजा  चन्द्रसेन को हुयी की उनके राज्य को अन्य राजाओं ने मणि प्राप्ति के लिए उनके राज्य के चारो द्वारो को घेर लिया हैं. और उनकी भारी सेना से जीत पाना भी संभव नहीं हैं. तब चन्द्रसेन ने अपने अराध्य देव महाकालेश्वर भगवान शिव की शरण में पहुंचे और उनके मंदिर में जा के सच्चे मन से अपने राज्य तथा मणि व जनता की रक्षा के लिए भगवान महाकाल की उपवास-व्रत लेकर आराधना में जुट गये...


पाँच वर्ष के बालक की भक्ति 
उस समय उनके राज्य में एक विधवा ग्वालिन रहती थी. जिसका एक 5 वर्ष का पुत्र भी था.  अपने पांच वर्षीय पुत्र के साथ  वह ग्वालिन महाकालेश्वर के दर्शन हेतु  उसी मंदिर में पहुंची जहा राजा चन्द्रसेन शिव की पूजा में मग्न थे. जब मंदिर के अन्दर राजा को भगवान शिव की आराधना में लीन देखा तो देखती रह गयी वो और उसका पुत्र बिना पलक झपकाए भावपूर्ण भाव से वाह के द्रश्य को निहारता रहा. तब उसकी माँ बाहर से ही महाकाल के दर्शन और पूजन कर वापस घर आ गयी. 


घर आते ही वह ग्वालिन का पांच वर्षीय पुत्र शिव की पूजा आराधना के लिए व्याकुल सा हो उठा और तुरंत ही घर से बाहर निकल आया और घर के बाहर एक सुन्दर सा पत्थर को ढूँढ़कर लाया और उसे शिव-लिंग की तरह घर के बाहर एकान्त और साफ़ स्थान पर रख कर अपनी उस उम्र की समझ के अनुसार उस पत्थर को शिव-लिंग मान कर अपने शुद्ध मन से भक्ति भावपूर्वक  गन्ध, धूप, दीप, नैवेद्य और अलंकार आदि चीजो को जुटाकर पूजा करना शुरू कर दिया. शिव-लिंग पर फूलो को चढ़ाता और दण्डवत प्रणाम करता यह क्रिया लगातार करता और शिव की भक्ति में इस कदर मग्न हो गया उसे और कोई चिंता ही ना थी..


इधर उसकी माँ खाना बना कर अपने पुत्र को आवाज़ लगाने लगी लेकिन वह तो भगवान की आराधना में लीन था आवाज़ नहीं सुन सका, बार बार आवाज़ देने पर भी जब वो खाने के लिए अन्दर नहीं आया तो ग्वालिन बाहर आई और देखी की उसका पुत्र एक पत्थर को रख कर अपनी आँखों को बंद कर के पूजा मग्न हैं. तब ग्वालिन उस बालक के पास आई और उसका हाथ खीच कर घर ले जाने लगी लेकिन बालक ने तो जैसे हठ कर ली हो. वो घर में जाने को तैयार ही था उसका मन तो  शिव जी की पूजा में रमा हुआ था . लाख समझाने पर भी वह बालक वहा से जाने को तैयार ना था. इस कारण उस ग्वालिन को बहुत गुस्सा आया और अपने पुत्र को मारा -पीटा मार खाने के बाद भी वह  बालक फिर भी वहा से जाने को तैयार न था.  


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Mahakal Ujjain Bhasma Aarti

और अधिक गुस्से के कारण उस माँ ने शिव-लिंग बने पत्थर को वहा से उठा कर दूर फेक दिया और वहा पर चढ़ी सभी पूजा सामग्रियों को उठा के फेक दी यह देख बालक जोर-जोर से रोने लगा बिलख-बिलख कर रोते हुए बालक को छोड़ वह माँ वापस घर के अन्दर चली गयी गुस्से में लाल होके.. इधर बालक की मासूम सी आँखों से आँसुओं की मानो झड़ी रुक ही नहीं रही थी लगातार रोता रहा देव! देव! महादेव! कहता हुआ चिल्लाता रहा. लगातार रोते रोते वह अपनी चेतना खोता चला गया और वही घरती पर मूर्छित (बेहोश) हो के गिर गया...

हाकाल की महिमा 
लेकिन कुछ देर बाद जब उसे हल्का हल्का होश आया तो वहा का दृश्य देख कर उसकी आंखे चकाचौध सी हो गयी, जैसे वह किसी स्वप्नलोक में आ गया हो. वह बालक घोर आश्चर्य में पड़ गया. 
जिस स्थान पर उसने एक पत्थर को रख कर पूजा कर रहा था उसी स्थान पर  महाकाल का दिव्य मन्दिर खड़ा दिखा जो  मणियों से जड़ित चमकीले खम्बे उस मंदिर की शोभा बढ़ा रहे थे.  स्फटिक मणि द्वारा उसकी छते चमक रही थी. मंदिर का शिवालय जो स्वर्ण से बना था. मंदिर का मुख्य द्वार भी  स्वर्ण से बने थे. मंदिर के बाहर कई चबूतरे बने थे जिनपर नीलमणि तथा अन्य हीरे-मोती जड़े हुए थे. मंदिर के अन्दर मध्य भाग में (गर्भगृह) में देवो के देव महादेव का रत्नमय लिंग प्रतिष्ठित था.


उस पांच वर्षीय बालक ने मंदिर के अन्दर जा कर शिवलिंग को बड़े ध्यानपूर्वक देखा. की उसके द्वारा पूजा में चढ़ाई गयी सभी सामग्री उस शिवलिंग पर सुसज्जित थी. और इसे देख बालक पूरी चेतना में आ गया और उसका मन जैसे खुले आकाश में उड़ते  आज़ाद पंक्षी की तरह हो गया. उसके ख़ुशी का ठिकाना ही ना रहा. उसे मन ही मन आश्चर्य तो बहुत हुआ लेकिन भगवान का स्मरण करते हुए बार बार अपने मस्तक को भगवान के चरणों में राकहने  लगा और महादेव महादेव का उच्चारण करने लगा. 

इसी तरह जब शाम हुयी तब वह बालक अपने घर की ओर चला जब अपने घर को देखा तब उसके ख़ुशी का ठिकाना ही ना रहा. उसका टुटा फूटा झोपड़ी समान घर किसी राजमहल की तरह हो गया था. चारो ओर परम उज्ज्वल वैभव से सर्वत्र प्रकाश हो रहा था. जब अन्दर गया तो देखा उसकी माँ किसी रानी की तरह स्वर्ण आभूषणों से लदी  थी. माँ ने जब अपने पुत्र को देखा तब वह भावविभोर होकर अपने पुत्र को छाती से लगा लिया.

उसके बाद वह ग्वालिन  अपने पुत्र के मुख से भगवान् शिव की इस लीला  का वर्णन सुन कर उस माँ ने राजा चन्द्रसेन को सूचित किया. जब राजा ने भगवान शंकर को प्रसन्न करने वाले उस ग्वालिन के पुत्र के बारे में जाना तो बिना बिलम्ब किये उसके पास पहुंचे और शिव की महिमा को देखा. 


उधर सभी राजा अपने सेन्यबल के साथ  पूरी उज्जयिनी को घेरे हुए थे जब उन राजाओं को यह बात अपने गुप्तचरों द्वारा पता चली तो सब के सब चकित से हो गए तब उन सभी राजाओ ने आपस में मिल कर पुनः विचार-विमर्श किया. जब राजा चन्द्रसेन के राज्य का एक छोटा सा बालक इतना बड़ा शिव भक्त हैं तो राजा कितना बड़ा शिव भक्त होगा. हम सब राजा चन्द्रसेन से विजय नहीं प्राप्त कर सकते और अगर हम युद्ध करते हैं तो स्वयं प्रभु महाकाल शिव को क्रोधित करने के समान हैं. और भगवान शिव के क्रोध करने पर हमें कोई नहीं बचा सकता और हम सब भस्म हो जायेंगे. मोक्ष की भी प्राप्ति नहीं होगी हमें.


हम सब को ऐसे राजा का विरोध नहीं करना जिस राजा की नगरी की रक्षा महादेव स्वयं महाकाल के रूप में करते हैं. इसलिए अब हम सब को  "चिन्तामणि" नामक महामणि का लालच त्याग कर राजा चन्द्रसेन से मित्रता कर ली जाए ताकि हम सब को भी भगवान महेश्वर का आशीर्वाद प्राप्त हो सके. 


और इसी तरह मणि के लालच में उज्जयिनी नगरी पर चढ़ाई कर युद्ध करने के उद्देश्य  से आये राजाओं का ह्रदय भगवान शिव ने अपने प्रभाव से परिवर्तित कर दिया. और वह सभी राजा अपने अपने हथियारों को  राजा चन्द्रसेन के आगे डाल दिया और मित्रता के लिए हाथ बढाया. और उन सभी के ह्रदय मन से राजा चन्द्रसेन के प्रति सभी बैर-भाव निकल गए. उसके बाद सभी राज्यों के राजाओं ने  महाकालेश्वर पूजन अर्चन किया...



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Mahakal Ujjain Bhasma Aarti
उसी समय श्री राम भक्त श्री हनुमान वहा प्रकट हुए और उस छोटे से ग्वालिन के पुत्र को गोद में उठाया और यह दृश्य वहा  उपस्थित सभी राजाओं देखा और आश्चर्य के मारे पलकें भी झपकान भूल गए और देखते के देखते ही रह गए. 

जाने श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की महिमा स्थापना सी जुडी कथा

तब श्री हनुमान ने बोला यहाँ उपस्थित सभी राजा और समस्त मनुष्य मेरी बात को ध्यान-पूर्वक सुने क्युकी यह बात सभी के लिए हितकारी और कल्याणकारी हैं. सभी को भगवान शिव में अपनी आस्था रखनी चाहिए और उनका नित्य ध्यान करना चाहिए क्युकी भगवान शिव से बढ़कर अन्य कोई गति नहीं है इस संसार में. 
ईदृशाशिशशवो यस्य पुयर्या सन्ति शिवव्रता:।स राजा चन्द्रसेनस्तु महाशंकरसेवक:।। 
नूनमस्य विरोधेन शिव: क्रोधं करिष्यति।त्क्रोधाद्धि वयं सर्वे भविष्यामो विनष्टका:।। 
तस्मादनेन राज्ञा वै मिलाय: कार्य एव हि।एवं सति महेशान: करिष्यति कृपा पराम्।।
अर्थात महेश्वर की कृपा-प्राप्ति ही मनुष्य रूपी जीवन को मोक्ष दिलाने का सबसे उत्तम साधन है. यह नगरी धन्य हो गयी इस छोटे से बालक गोप कुमार के कारण आज यहाँ उपस्थित सभी लोगो को महादेव कालेश्वर के रूप में अवतरित इस शिव-लिंग के दर्शन का पुन्य इस बालक द्वारा मिला हैं. इस गोप कुमार से सभी प्राणी प्रेरणा ले.  

जो किसी भी तरह के वैदिक मन्त्र को नहीं जानता और बिना मन्त्रो के जाने ही अपनी भक्ति-भाव-निष्ठां से भगवान शिव की आराधना कर उन्हें प्रसन्न किया और उन्हें प्राप्त कर लिया. और यह परम सौभाग्य का विषय है कि इस गोप कुमार ने शिवलिंग का दर्शन किया.


महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की कहानी

इस गोप कुमार की आठ पीढ़ी होगी और आठवीं पीढ़ी में महायशस्वी नन्द जन्म लेंगे और उनके ही यहाँ साक्षात नारायण श्री कृष्ण के रूप में जन्म लेंगे. और यह गोप बालक भी ‘श्रीकर’ गोप के नाम से जाना जायेगा और इसकी प्रसिद्धि दूर-दूर तक होगी. और इसी तरह  राजा चन्द्रसेन की नगरी उज्जयिनी में श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की स्थापना हुयी..

 व्य मन्दिर
उज्जैन  के पवित्र क्षिप्रा नदी से कुछ दूरी पर महाकाल ज्योतिर्लिंग स्थित हैं. यह मंदिर पांच मंजिला हैं. मंदिर के उपरी भाग में देवो के देव श्री ओंकारेश्वर विद्यमान है. यहाँ की यातायात-व्यवस्था और सुरक्षा-सुविधा की दृष्टि को देखते हुए तीर्थयात्री (दर्शनार्थियों) को पंक्ति (लाइन) बनाकर सरोवर के किनारे किनारे से चल कर ऊपर की मंज़िल में जाना होता है. और वहा की पतली सकरी गलियों की सीढ़ी से होते हुए मंदिर के नीचले हिस्से में आना होता जहा विराजमान हैं  महाकालेश्वर का ज्योतिर्लिंग, जिनके दर्शन मात्र से ही सरे दुःख दर्द दूर हो जाते हैं और परम आनंद की अनुभूति होती है. 


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Mahakal Ujjain Darshan
साथ ही रामघाट और कोटितीर्थ कुण्डों में भी स्नान किया जाता है. और यहाँ पितरों का श्राद्ध-तर्पण भी किया जाता है.   स्नान के बाद इन कुण्डों समीप स्थित कई अन्य शिवलिंग भी हैं जैसे अगस्त्येश्वर, कोढ़ीश्वर, केदारेश्वर तथा हरसिद्धि देवी आदि इनके दर्शन करते हुए ही दर्शनार्थी महाकालेश्वर के दर्शन हेतु जाते हैं.   
आकाशे तारकं लिंगं पाताले हाटकेश्वरम् ।भूलोके च महाकालो लिंड्गत्रय नमोस्तु ते   

इसका तात्पर्य यह है कि आकाश में तारक लिंग, पाताल में हाटकेश्वर लिंग तथा पृथ्वी पर महाकालेश्वर ही मान्य शिवलिंग है.  
ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर का विभिन्न अवसरों पर होने वाले आकर्षक श्रृंगार और उत्सव 
  1. श्रामण माह में
  2. शिवरात्रि को
  3. नागपंचमी
  4. भाग पूजा
  5. भात-पूजा
  6. उमा-महेश्वर व्रत
  7. साँझी उत्सव- मालवा की परम्परानुसार यह उत्सव आयोजित होता है
महाकालेश्वर  पूजा
  • अभिषेक महिम्न स्रोत.
  • रुद्राभिषेक वैदिक पूजा.
  • रुद्राभिषेक ग्यारह दर्शना वैदिक पूजा.
  • लघु रूद्र.
  • महारूद्र रूद्राभिषेक 11 एक दर्शना वैदिक पूजा.
  • भाँग पूजा.
  • भण्डारा, अन्नकूट भी करवाया जा सकता है.
कैसे पहुंचे उज्जैन?
आप उज्जैन में महाकाल के दर्शन के लिए ट्रेन द्वारा सड़क मार्ग द्वारा और साथ हवाई मार्ग द्वारा भी पहुँच सकते हैं.

 ट्रेन द्वारा
उज्जैन का जो मुख्य रेलवे स्टेशन है जो की भारत के सभी प्रमुख रेलवे स्टेशनों से जुड़ा है. श्रद्धालु  उज्जैन से इंदौर, दिल्ली, पुणे, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता, जम्मू, भोपाल, जयपुर, वाराणसी, गोरखपुर, रतलाम, अहमदाबाद, बड़ौदा, ग्वालियर, हैदराबाद, बैंगलोर और अन्य कई बड़े शहरों के लिए सीधी रेलगाडि़याँ ले सकते हैं.

सड़क मार्ग (बस, टैक्सी)
उज्जैन शहर राज्य सड़क परिवहन की सार्वजनिक बसों द्वारा जुड़ा है. आप बस द्वारा भी आ सकते हैं. यहाँ नियमित बसें उपलब्ध हैं. डीलक्स एसी और सुपरफास्ट जैसी भी बसे उपलब्ध हैं. यहाँ की सड़क सभी मुख्य शहरों और राज्यों से जुडी है. 

हवाई सेवा द्वारा
उज्जैन के शहर के सबसे पास इन्दौर का देवी अहिल्याबाई होलकर हवाई अड्डा है जो यहाँ से 55 कि.मी की दूरी पर स्थित है.  पर्यटक उज्जैन तक आने के लिए इन्दौर हवाई अड्डे से टैक्सी भी ले सकते हैं. और इन्दौर से उज्जैन तक आने के लिए यात्री बस भी ले सकते हैं.

  • उज्जैन 55 किमी दूर इन्दौर हवाई अड्डा है. 
  • उज्जैन172 किमी दूर भोपाल हवाई अड्डा है.  

महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग का इतिहास


दोस्तों  "12  ज्योतिर्लिंग दर्शन" नाम के  इस आर्टिकल में  जाने श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की महिमा स्थापना सी जुडी कथा और इतिहास से जुड़े इस लेख को लिखने में मुझसे जो भी त्रुटी हुयी हो उसे छमा करे  और हमारा इस विषय में सहयोग दे ताकि मैं अपनी गलतियों को सुधार  सकू. 
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नमस्कार दोस्तों Wahh Hindi Blog की और से आप सभी को धन्यवाद देता हु, की आप सभी ने इस ब्लॉग को अपना समझा. साथ ही अपना प्यार और सहयोग दिया.

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