Thursday, 25 May 2017

रास बिहारी बोस की जीवनी / Ras Behari Bose Biography

 जाने आज़ादी के दीवाने प्रख्यात क्रांतिकारी नेता रास बिहारी बोस की जीवन को नजदीक से ? 

आज़ादी के दीवाने भारत के लाल प्रख्यात क्रांतिकारी नेता, प्रसिद्द वकील और शिक्षाविद रास बिहारी बोस जिन्होने अंग्रेजी हुकुमत के खिलाफ  ‘गदर’ एवं ‘आजाद हिन्द फौज’ के संगठन में अपनी एक विशेष महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. और अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध क्रान्तिकारी गतिविधियों का संचालन किया. और अपना सम्पूर्ण जीवन भारत की आज़ादी दिलाने में लगा दी.. स्वाधीनता आंदोलन के इतिहास में इनका नाम सदैव स्वर्णाक्षरों में अंकित रहेगा..
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Ras Behari Bose Biography

 रास बिहारी बोस की जीवनी / Ras Behari Bose Biography

प्रारंभिक जीवन परिचय :- 


आज़ादी के दीवाने भारत के लाल प्रख्यात क्रांतिकारी नेता,  प्रसिद्द वकील और शिक्षाविद रास बिहारी बोस का जन्म  25 मई  1886 को पश्चिम बंगाल के वर्धमान ज़िले में स्थित सुबालदह गाँव में हुआ था. इनके पिता जी का नाम विनोद बिहारी बोस था. रास बिहारी बोस जब मात्र तीन वर्ष के थे तब ही उनकी माता का स्वर्गवास हो गया और उनका पालनपोषण मामी के द्वारा हुआ. 

शिक्षा  
इनकी प्रारंभिक शिक्षा  चन्दननगर से शुरू हुयी क्युकी उनके पिता उस समय वही कार्यरत थे. और अपनी आगे की भी शिक्षा चन्दननगर के डुप्लेक्स कॉलेज से ग्रहण की. 

अपने देश भारत के प्रति बचपन से ही श्रद्धा थी उनके ह्रदय में और वो हमेशा देश की स्वतन्त्रता के लिए  स्वप्न देखा करते थे. और उनकी रूचि बचपन से ही  क्रान्तिकारी गतिविधियों में  थी. और  उन्हें अपने शिक्षक "चारू चांद" से उन्हें देश की आज़ादी के प्रति प्रेरणा मिलती रही. 

क्रांतिकारी जीवन की शुरुआत 


अपनी शिक्षा को पूर्ण करने के पाश्चात्य देहरादून में हेड क्लर्क के रूप में वन अनुसंधान संस्थान में कार्य करने लगे. और उसी दौरान उनकी मुलाकात और परिचय होता हैं अमरेन्द्र चटर्जी से जो की क्रान्तिकारी जतिन मुखर्जी की अगुआई में चल रहे युगान्तर नामक क्रान्तिकारी संगठन से जुड़े थे ..  और  अमरेन्द्र चटर्जी से हुयी मुलाकात के बाद  रास बिहारी बोस बंगाल के क्रान्तिकारियों के साथ जुड़ गये. और उसी के बाद वह "अरबिंदो घोष" के राजनीतिक शिष्य रहे "जतीन्द्रनाथ बनर्जी "उर्फ निरालम्ब स्वामी के सम्पर्क में आये और उसी  के बाद संयुक्त प्रान्त, (वर्तमान उत्तर प्रदेश) और पंजाब के प्रमुख आर्य समाजी क्रान्तिकारियों के काफी निकट आ गए . साथ ही  क्रान्तिकारियों गतिविधियों सक्रीय भूमिका में रहने लगे,

12 दिसंबर 1911 को दिल्ली में हुए  जार्ज पंचम के दिल्ली दरबार के बाद जब वायसराय लॉर्ड हार्डिंग के सम्मान में  दिल्ली के अन्दर एक शोभा सवारी निकाली जा रही थी. तब वायसराय लार्ड हार्डिंग पर बम फेका गया . बम फेंकने की योजना बनाने में रासबिहारी की प्रमुख भूमिका रही थी. और इस बम को फेका महान  क्रान्तिकारी "अमरेन्द्र चटर्जी" के  शिष्य "बसन्त कुमार विश्वास" ने लेकिन निशाना सही से ना लगने के कारण  वायसराय लार्ड हार्डिंग बाल बाल बच गए.  और बम फेकने के कारण "बसन्त कुमार विश्वास" पकड़े गए. और इसके बाद ब्रिटिश पुलिस रासबिहारी बोस के पीछे भी लग गयी लेकिन पुलिस को चकमा देते हुए रातो-रात रेलगाडी द्वारा देहरादून को रवाना हो गए. 

और देहरादून पहुँच कर अपने कार्यो में लग गए जैसे की कुछ हुआ ही ना हो. ये इस कारण किया की ब्रिटिश पुलिस को उन पर कोई शक ना हो की बम फेकने में उनका मुख्य योगदान था. ब्रिटिश पुलिस को चकमा देने के लिए दुसरे दिन ही एक सभा बुलाई , और घोर निंदा की  वायसराय लॉर्ड हार्डिंग पर हुए हमले की. और इनकी सूझ-बुझ के कारण किसी को शक नहीं हुआ की इनका हाथ था इस बम कांड हमले में. 

प्रख्यात क्रांतिकारी जतिन मुखर्जी से मुलाकात 

1913 बंगाल में आई बाढ़  में राहत कार्य के लिए जुटे रासबिहारी बोस की मुलाकात जतिन मुखर्जी से हुयी और उनके करीब आ गए. देश की आज़ादी को लेकर "जतिन मुखर्जी " ने रासबिहारी बोस में एक नया जोश भर दिया. जिसके कारण वे दुगने उत्साह से देश की आज़ादी के लिए एक नयी सोच और जोश के साथ क्रान्तिकारी गतिविधियों के संचालन में जुट गये..

गदर योजना 

प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारत की धरती को गुलामी की जंजीरों से आज़ाद करने के लिए गदर की योजना बनायी. और फरवरी 1915 में देश की स्वतंत्रता के लिए लड़ रहे अनेको  भरोसेमंद क्रान्तिकारियों को सेना में घुसपैठ कराने की कोशिश की गयी. 

उनके द्वारा चलाये जा रहे क्रांतिकारी गतिविधियों का मुख्य केंद्र रहा "वाराणसी" जहा से उन्होंने गुप्त रूप से सारे क्रांतिकारी आंदोलनों का संचालन किया..  

सशस्त्र क्रांति’ की योजना 

प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान कई क्रांतिकारी ने मिल कर सशस्त्र क्रांति’ की योजना बनाई और इस योजना में मुख्य भूमिका रासबिहारी बोस ने निभाई. 

प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान अधिकतर सैनिक देश से बाहर गये हुये थे. और इसी को देखते हुए क्रांतिकारियों ने सोचा था कि अधिकतर सैनिक तो देश से बाहर गये हुये.  और कुछ ही सैनिक हैं जिन्हें हराना कोई मुश्किल कार्य नहीं हैं.  लेकिन  परिणाम इसके विपरीत हुआ. और इनका यह प्रयास  दुर्भाग्य के कारण असफल  हो गया. और इसके कारण कई क्रान्तिकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया. 

लेकिन इससे एक बात जरुर साफ़ होती हैं की  सन 1857 की यह "सशस्त्र क्रांति" की योजना ब्रिटिश सरकार को जड़ से समाप्त कर देने की पहली  व्यापक और विशाल क्रांतिकारी प्रयत्न था.

रासबिहारी बोस के कदम पड़े जापान में  

"सशस्त्र क्रांति" की योजना के बाद ब्रिटिश खुफिया पुलिस रासबिहारी बोस को पकड़ने के लिए उनके पीछे पड़  गयी. जिसके कारण  जून 1915 में राजा पी. एन. टैगोर के छद्म नाम से रासबिहारी बोस  जापान के शहर शंघाई पहुँच गए. और पहुंचते ही मुलाकात की अपने जापानी क्रान्तिकारी मित्रों से और उन्ही के साथ रह कर अपने देश की आज़ादी के लिए कार्य करने लगे. 

और जापान में रह कर उन्होंने अंग्रेजी अध्यापन, लेखन और पत्रकारिता का भी कार्य  प्रारंभ किया. और वही रह कर न्यू एशिया नाम से एक समाचार-पत्र भी निकाला और उसका संचालन भी किया. और उन्होंने जापानी भाषा को सिखा और उसी के बाद 16 पुस्तकें भी लिखीं. और हिन्दू धर्मग्रन्थ  'रामायण' को जापानी भाषा में अनुवाद किया. 

टोकियो में एक होटल को खोला और वही से भारतीयों को संगठित करना शुरू किया. उधर ब्रिटिश सरकार लगातार उनके पीछे लगी हुई थी और वो जापान सरकार से उनकी गिफ्तारी की मांग कर रही थी. जिसके चलते लगातार एक वर्ष तक रास बिहारी बोस अपनी पहचान को बदल बदल कर आवास भी बदलते रहे .

जापान में विवाह  

रासबिहारी बोस ने अपना विवाह सन 1916 में प्रसिद्ध पैन एशियाई समर्थक सोमा आइजो और सोमा कोत्सुको की पुत्री से कर लिया. और उसी के बाद  सन 1923 में बोस को जापान की नागरिकता प्राप्त हो गयी. 

इंडियन इंडीपेंडेंस लीग की स्थापना 

देश की आजादी के आन्दोलन को उनका सक्रिय समर्थन दिलाने के लिए जापानी अधिकारियों को भारतीय राष्ट्रवादियों के पक्ष में खड़ा करने और उनका सक्रिय समर्थन दिलाने में भी रासबिहारी बोस की अहम भूमिका रही. 

और उन्होंने 28 मार्च 1942 को एक सम्मेलन का आयोजन टोक्यो में किया और एक सभा बुलाई जिसमे  'इंडियन इंडीपेंडेंस लीग' की स्थापना का निर्णय किया गया. और इस सम्मलेन में एक और प्रस्ताव रखा. भारत देश की आज़ादी के लिए एक सेना बनाने की. 

 इंडियन नेशनल आर्मी (आई०एन०ए०) 

बैंकाक में इंडियन इंडीपेंडेंस लीग का दूसरा सम्मेलन रास बिहारी बोस  जून 1942 को रखा. और इस सम्मलेन में लीग में शामिल होने और उसका अध्यक्ष बनने के लिए सुभाष चंद्र बोस को आमन्त्रित किया गया और उनके सामने यह प्रस्ताव रखा.

जापान ने मलय और बर्मा के मोर्चे पर कई भारतीयों को  युद्धबन्दियों के रूप में  पकड़ा था. इन्ही  युद्धबन्दियों को इण्डियन इण्डिपेण्डेंस लीग में शामिल होने और इंडियन नेशनल आर्मी (आई०एन०ए०) का सैनिक बनने के लिये प्रोत्साहित किया गया. 

 सितम्बर 1942 में इण्डियन नेशनल लीग की सैन्य शाखा के रूप में किया. और इसी के साथ  झंडे का भी चयन किया और जिसे आज़ाद नाम दिया. और इस झंडे को उन्होंने सुभाष चंद्र बोस के हवाले किया.

आजाद हिन्द फौज के नाम से इंडियन नेशनल आर्मी का पुनर्गठन 

रासबिहारी बोस देश की आज़ादी को लेकर और आगे बढ़ने वाले ही थे तभी जापानी सैन्य कमान ने उन्हें और जनरल मोहन सिंह को आई०एन०ए० के नेतृत्व से हटा दिया. लेकिन इसके बावजूद आई०एन०ए० का संगठनात्मक ढाँचा बना रहा. 

और इसी के बाद सुभाष चंद्र बोस ने आई०एन०एस० का पुनर्गठन किया और उसका नाम दिया आजाद हिन्द फौज रखा..

अलविदा कह गए रास बिहारी बोस 

गुलामी में जकड़ी भारत की ज़मीं को ब्रिटिश सरकार से आज़ादी दिलाने के लिए कड़े संघर्ष करते हुए 21 जनवरी 1945 को हम सब से अलविदा कह परलोक सिधार गए..

 सम्मान 
रास बिहारी बोस के निधन के पहले जापानी सरकार ने ‘आर्डर आफ द राइजिंग सन’ के सम्मान से अलंकृत किया था..

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दोस्तों यह लेख लिखने में  हमने काफी कोशिश की हैं की गलती नही हो अगर कही कोई त्रुटी हुयी हो तो हमें छमा करे और उन गलतियों को बताये ताकि हम उसे सुधार सके.. आप सभी का धन्यवाद जो आपने इस पोस्ट को पढ़ा....  

भारत की आज़ादी के दीवानों की जीवनी और विचारो को जानने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाए 

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