Thursday, 13 April 2017

औरतें बेहद अजीब होतीं हैं - गुलज़ार साहब बेहतरीन कविता

Aurate Behad Ajeeb Hoti Hain. Gulzar Sahab Ki Rachana

गुलज़ार साहब किसी परिचय के मोहताज़ नहीं इन्हें  कौन नहीं जानता गुलज़ार भारतीय कवी गीतकार नाटककार फ़िल्म निर्देशक  और पटकथा लेखक, के रूप में भारत ही नहीं विदेशो में भी प्रसिद्द हैं इनका जन्म जन्म-18अगस्त 1936 में पंजाब के झेलम जिला दीना गाँव में हुआ  था, जो भारत पाक बटवारे में यह स्थान अब पाकिस्तान में चला गया  है.. बटवारे के बाद उनका परिवार अमृतसर में आकर बस गया .. इनका पूरा नाम सम्पूर्ण सिंह कालरा उर्फ़ गुलज़ार हैं.. 
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Aurate Behad Ajeeb Hoti Hain Gulzar

गुलज़ार साहब को सिनेमा जगत से कई प्रसिद्ध अवार्ड्स भी मिले उन्हें 2009 में डैनी बॉयल निर्देशित फिल्म स्लम्डाग मिलियनेयर के लिए सर्वश्रेष्ठ गीत का ऑस्कर पुरस्कार मिला हैं.  उनके द्वारा लिखे गीत जय हो के लिये.भारत सरकार द्वारा सन 2004 कला क्षेत्र में पद्म भूषण से सम्मानित भी किया गया था.

तो दोस्तों आईये आज इस आर्टिकल में पढ़ते हैं गुलज़ार द्वारा लिखी गयी कविता "औरतें बेहद अजीब होतीं है" इस कविता में औरतों के  दर्द सोच ख्याल चिंता तथा परिवार के प्रति अपनापन दोस्तों यह बेहतरीन कविता आप को बेहद पसंद आएगी... क्युकी इन दिनों यह कविता  खूब पढ़ी और सराही  जा रही  है. 
तो देर कैसी आईये आज पढ़ते हैं गुलज़ार साहब की यह रचना   "सच मे, औरतें बेहद अजीब होतीं हैं". 




Aurate Behad Ajeeb Hoti Hain. Gulzar Sahab Ki Rachana




लोग सच कहते हैं 
"औरतें बेहद अजीब होतीं है"
रात भर पूरा सोती नहीं
थोड़ा थोड़ा जागती रहतीं है.

नींद की स्याही में
उंगलियां डुबो कर
दिन की बही लिखतीं
टटोलती रहतीं है.

दरवाजों की कुंडियाॅ
बच्चों की चादर
पति का मन.

और जब जागती हैं सुबह
तो पूरा नहीं जागती
नींद में ही भागतीं है.

[सच है औरतें बेहद अजीब होतीं हैं]

हवा की तरह घूमतीं, कभी घर में, कभी बाहर.
टिफिन में रोज़ नयी रखतीं कविताएँ
गमलों में रोज बो देती आशाऐं.

पुराने अजीब से गाने गुनगुनातीं
और चल देतीं फिर
एक नये दिन के मुकाबिल
पहन कर फिर वही सीमायें
खुद से दूर हो कर भी
सब के करीब होतीं हैं.

"औरतें सच में, बेहद अजीब होतीं हैं"

कभी कोई ख्वाब पूरा नहीं देखतीं
बीच में ही छोड़ कर देखने लगतीं हैं
चुल्हे पे चढ़ा दूध.

कभी कोई काम पूरा नहीं करतीं,
बीच में ही छोड़ कर ढूँढने लगतीं हैं.
बच्चों के मोजे, पेन्सिल, किताब
बचपन में खोई गुडिया,
जवानी में खोए पलाश,

मायके में छूट गयी स्टापू की गोटी,
छिपन-छिपाई के ठिकाने
वो छोटी बहन छिप के कहीं रोती.

सहेलियों से लिए-दिये.
या चुकाए गए हिसाब
बच्चों के मोजे, पेन्सिल किताब

खोलती बंद करती खिड़कियाँ
क्या कर रही हो?
सो गयी क्या ?
खाती रहती झिङकियाँ

न शौक से जीती है ,
न ठीक से मरती है.
कोई काम ढ़ंग से नहीं करती है.

सच है, औरतें बेहद अजीब होतीं हैं.

कितनी बार देखी है…
मेकअप लगाये,
चेहरे के नील छिपाए
वो कांस्टेबल लडकी,
वो ब्यूटीशियन,
वो भाभी, वो दीदी…

चप्पल के टूटे स्ट्रैप को
साड़ी के फाल से छिपाती
वो अनुशासन प्रिय टीचर
और कभी दिख ही जाती है
कॉरीडोर में, जल्दी जल्दी चलती,
नाखूनों से सूखा आटा झाडते,

सुबह जल्दी में नहाई
अस्पताल मे आई वो लेडी डॉक्टर
दिन अक्सर गुजरता है शहादत में
रात फिर से सलीब होती है…

सच है, औरतें बेहद अजीब होतीं हैं

सूखे मौसम में बारिशों को
याद कर के रोतीं हैं
उम्र भर हथेलियों में
तितलियां संजोतीं हैं

और जब एक दिन
बूंदें सचमुच बरस जातीं हैं
हवाएँ सचमुच गुनगुनाती हैं
फिजाएं सचमुच खिलखिलातीं हैं

तो ये सूखे कपड़ों, अचार, पापड़
बच्चों और सारी दुनिया को
भीगने से बचाने को दौड़ जातीं हैं.

सच है, औरतें बेहद अजीब होतीं हैं.

खुशी के एक आश्वासन पर
पूरा पूरा जीवन काट देतीं है
अनगिनत खाईयों को
अनगिनत पुलो से पाट देतीं है.

सच है, औरतें बेहद अजीब होतीं हैं.

ऐसा कोई करता है क्या?
रस्मों के पहाड़ों, जंगलों में
नदी की तरह बहती…
कोंपल की तरह फूटती…

जिन्दगी की आँख से
दिन रात इस तरह
और कोई झरता है क्या?
ऐसा कोई करता है क्या?

सच मे, औरतें बेहद अजीब होतीं हैं...


.


औरतें बेहद अजीब होतीं हैं - गुलज़ार साहब बेहतरीन कविता




Log Sach Kahate Hain,
"Aurate Behad Ajeeb Hoti Hoti Hain"
Raat Bhar Pura Soti Nahi
Thoda Thoda Jagati Rahati Hai,
Nind Ki Syahi Me Ungaliyan Ubo Kar
Din Ki Bahi Likhati Hain,
Darwajo Ki Kundiyan, Bachcho Ki Chadar,
Pati Ka Mann...

Aur Jab Jagati Hain Subah, To Pura Nahi Jagati Hain.
Nind Me Hi Bhagati Hain...

"Aurate Behad Ajeeb Hoti Hoti Hain"

Hawa Ki Tarah Ghumati, Kabhi Ghar Me Kabhi Bahar..
Tifin Me Roz Nayi Rakhati Kavitayen
Gamalo Men Roz Bo Deti Aashayen..

Purane Ajeeb Se Gaane Gungunati
Aur Chal Deti Fir ..
Ek Naye Din Ke Mukabil.
Pahan Kar Fir Wahi Seemayen
Khud Se Dur Hokar Bhi 
Sach ke Kareeb Hoti Hain..
Sach Men Aurate Behad Ajeeb Hoti Hoti Hain

Kabhi Koi Khwab Pura Nahi Dekhati
Beech Men Hi Chhud Kar Dekhane Lagati Hain
Chulhe Pe Chadha Dudh.....
Kabhi Koi Kaam Pura Nahi Karati
Beech Men Hi Chhod Kar Dhundhane Lagati Hain,
Bachcho Ke Moje, Pensil, Kitab
Bachapan Me Khoyi Gudiya
Jawani Me Khoye Palas,

Mayake Me Chhut Gayi Stapu Ki Goti,
Chhipan-Chhipayi Ke Thikane
Wo Chhoti Bahan Chhip Ke Kahi Roti..

Saheliyon Se Liye Diye...
Ya  Chukaye Gaye Hisab
Bachcho Ke Moje, Pensil, Kitab

Kholati Band Karati Khidakiyan
Kya Kar Ho?
So Gayi Kya?
Khati Rahati Khidakiyan

Naa Shaukh Se Jeeti Naa Thik Se Marati Hai,
Koi Kaam Dhang Se Nahi Karati.
Sach Hai, "Aurate Behad Ajeeb Hoti Hai"..

Kitani Baar Dekhi Makeup Lagaye
Chaihare Ke Neel Chhipaye
Wo Kastebal Ladaki Wo Beautician
Wo Bhabhi Didi.

Chappal Ke Tute Step Ko
Saree Ke Faal Se Chhipati
Wo Anushasan Priy Teacher 
Aur Kabhi Dikh Hi Jati
Corridor M, Jaldi Jaldi Chalati,
Nakhuno Se Sukha Aata Jhadate,

Subah Jladi Me Nahayi
Aspatal Me Wo Lady Doctor
Din Aksar Guzarata Hai Shahadat Me
Raat Fir Se Salib Hoti Hai...
Sach Hain Aurate Behad Ajeeb Hoti Hain..

Sukhe Mausam Me Barisho Ko 
Yaad Kar Ke Roti Hain
Umr Bhar Hatheliyon Men
Titliya Sanjoti Hain
Aur Jab Ek Din
Bunde Sachmuch Baras Jati Hai
Hawanye Sachmuch Gungunati Hai
Fijayen Sachmuch Khilkhilatin Hain

To Ye Sukhe Kapadon, Achar, Papad
Bachcho Aur Sari Duniya Ko
Bhigane Se Bachane Ko Daud Jati Hai...

Sach Hain Aurate Behad Ajeeb Hoti Hain..

Khushi Ke EK aNUSHASAN pAR
Pura Pura Jeevan Kaat Detin Hain
Angeenat Khayiyo Ko
Angeenat Pulo Se Paat Deti Hai.
Sach Hain Aurate Behad Ajeeb Hoti Hain..
Yesa Koi Karata Hain Kya?
Rasmo Ke Pahadon Ke Jangalo Men
Nadi Ki Tarah Bahati...

Konpal Ki Tarah Futati..
Zindagi Ki Ankh Se Din Raat Is Tarah
Aur Koi Jharata Hain Kya?
Yesa Koi Karata Hai Kya ?
Sach Hain Aurate Behad Ajeeb Hoti Hain..


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