Wednesday, 29 March 2017

Ashok Chakradhar Ki Hasya Kavita In Hindi

अशोक चक्रधर की हास्य कविता

विशिष्ट प्रतिभा के धनी डॉ॰ अशोक चक्रधर' इनका जन्म उत्तर प्रदेश के खु्र्जा जिले के  अहीरपाड़ा मौहल्ले में 8 फ़रवरी, सन 1951  में हुआ. और इनके पिता श्री  डॉ॰ राधेश्याम 'प्रगल्भ'  जो की अध्यापक, कवि, संपादक और बाल साहित्यकार थे.  इसी कारण डॉ॰ अशोक चक्रधर का रुझान बचपन से ही लेखन के कार्य  में रहा. उन्हें अपने कवि पिता द्वारा  साहित्यिक मार्गदर्शन मिला तथा पिता  श्री के कवी मित्रो से मुलाकात  गोष्ठियों के माध्यम से  उन्हें कविता लेखन की अनौपचारिक शिक्षा मिली.

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सबसे पहली अपनी कविता 1960 में देश के रक्षामंत्री 'कृष्णा मेनन' को सुनाई. और उन्हें इस कविता पर काफी सराहा गया.

और इसी के साथ 1962 में एक कवि के रूप में अपनी  मंचीय जीवन की पहली कविता पढ़कर सुनाई..  वो दिन अशोक चक्रधर जी के लिए महत्वपूर्ण दिन था. अपनी कविता का पाठ  पढ़ कर "पं.सोहनलाल द्विवेदी" जी का आशीर्वाद भी प्राप्त किया. और यह कवी सम्मलेन उनके पिता जी  द्वारा आयोजित किया गया था जिसकी अध्यक्षता पं.सोहनलाल द्विवेदी जी ने की थी. और उसके बाद कभी पीछे मुड कर नहीं देखा. और वो लगातार आगे बढ़ते रहे...  

बहुमुखी प्रतिभा के धनी डॉ॰ अशोक चक्रधर केवल कविता लेखन के कार्य में ही आगे नहीं थे साथ साथ वो धारावाहिक लेखक, कलाकार , वृत्तचित्र लेखक निर्देशक, टेलीफ़िल्म लेखक, निर्देशक, अभिनेता, के रूप में कार्यरत हैं एसे कम ही विशिष्ट प्रतिभा के लोग होते हैं. 

2014 में उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया गया।

डॉ॰ अशोक चक्रधर द्वारा प्रकाशित कुछ कृतियाँ इस प्रकार हैं
जाने क्या, टपके,  सो तो है, बोल-गप्पे,  तमाशा, चुटपुटकुले, मसलाराम,  भोले भाले,  इसलिये बौड़म जी इसलिये, जो करे सो जोकर, बूढ़े बच्चे, हंसो और मर जाओ, 
तो देर कैसी आईये पढ़ते हैं आज इस आर्टिकल के माध्यम से  डॉ॰ अशोक चक्रधर' जी द्वारा लिखी कुछ मजेदार हास्य रचना जो आप को हंसा हंसा लोटपोट कर देगी... 



हिंदी की हो रही दुर्दशा पर काका हाथरसी यह रचना 

नदी में डूबते आदमी ने
पुल पर चलते आदमी को
आवाज लगाई- बचाओ,

पुल पर चलते आदमी ने
रस्सी नीचे गिराई
और कहा,, "आओ",

नीचे वाला आदमी
रस्सी पकड़ नहीं पा रहा था
और रह-रहकर चिल्ला रहा था,

मैं मरना नहीं चाहता बड़ी महंगी ये जिंदगी है
कल ही तो एबीसी कंपनी में मेरी नौकरी लगी है.

इतना सुनते ही पुल वाले आदमी ने
रस्सी ऊपर खींच ली और उसे मरता देख
अपनी आंखें मींच ली.....

दौड़ता-दौड़ता एबीसी कंपनी पहुंचा
और हांफते-हांफते बोला...

अभी-अभी आपका एक आदमी डूब के मर गया है
इस तरह वो, आपकी कंपनी में एक जगह खाली कर गया है,
ये मेरी डिग्रियां संभालें बेरोजगार हूं, 
उसकी जगह मुझे लगा लें...

ऑफिसर ने हंसते हुए कहा
भाई, तुमने आने में तनिक देर कर दी.....
ये जगह तो हमने अभी दस मिनिट पहले ही भर दी..

और इस जगह पर हमने उस आदमी को लगाया है....
जो उसे धक्का देकर तुमसे दस मिनिट पहले यहां आया है.. 😂😂😂



Ashok Chakradhar Ki Hasya Kavita Archives In Hindi


हिंदी की हो रही दुर्दशा पर काका हाथरसी यह रचना 

जंगल में बंगले, बंगले ही बंगले
नए नए बनते गए, बंगले ही बंगले..

बंगलों में चारों ओर, जंगले ही जंगले
छोटे-छोटे बड़े-बड़े जंगले ही जंगले...

जंगल से काटी गई, लकड़ी ही लकड़ी,
चीरी गई पाटी गई लकड़ी ही लकड़ी....

चौखट में द्वारों में, लकड़ी ही लकड़ी
फ़र्शों दीवारों में लकड़ी ही लकड़ी...

मानुस ने मार बड़ी, मारी जी मारी,
लकड़ी से तगड़ी थी आरी जी आरी

आरी के पास न थीं आंखें जी आंखें,
कटती गईं कटती गईं शाखें ही शाखें...

बढ़ते गए बढ़ते गए, बंगले ही बंगले,
जंगल जी होते गए कंगले ही कंगले...

हरा रंग छोड़ छाड़, भूरा भूरा रंग ले,
जंगल जी कंगले या बंगले जी कंगले ?


अशोक चक्रधर की हास्य कविता


हिंदी की हो रही दुर्दशा पर काका हाथरसी यह रचना 


हाए हाए!!! दरोगा जी 
कुछ समझ नहीं पाए..

आश्चर्य में जकड़े गए, जब सिपाही ने  उन्हें बताया
रामस्वरूप ने चोरी की फलस्वरूप पकड़े गए...

""दरोगा जी बोले ये क्या रगड़ा है ?""
रामस्वरूप ने चोरी की तो भला
बिना बात फलस्वरूप को  क्यों पकड़ा है?

"सिपाही  बार-बार दोहराए
रामस्वरूप ने चोरी की फलस्वरूप पकड़े गए....
पकड़े गए जी पकड़े गए पकड़े गए जी पकड़े गए.....

"दरोगा भी लगातार उस पर अकड़े गए"
दृश्य देखकर मैं अचंभित हो गया,
लापरवाही के  अपराध में
भाषा-ज्ञानी सिपाही निलंबित हो गया........ 😂😂😂


डॉ॰ अशोक चक्रधर' की  मजेदार हास्य रचना



हिंदी की हो रही दुर्दशा पर काका हाथरसी यह रचना 

बंधुओ, उस बढ़ई ने चक्कू तो ख़ैर नहीं लगाया पर, 
आलपिनें लगाने से बाज़ नहीं आया..

ऊपर चिकनी-चिकनी रेक्सीन, अन्दर ढेर सारे आलपीन..
तैयार कुर्सी नेताजी से पहले दफ़्तर में आ गई,
नेताजी आएतो देखते ही भा गई..

और,बैठने से पहले एक ठसक, एक शान के साथ
मुस्कान बिखेरते हुए उन्होंने टोपी संभालकर मालाएं उतारीं,
गुलाब की कुछ पत्तियां भी कुर्ते से झाड़ीं,

फिर गहरी सांस लेकर चैन की सांस लेकर 
कुर्सी सरकाईऔर भाई, बैठ गए...

बैठते ही ऐंठ गए..
दबी हुई चीख़ निकली, सह गए पर बैठे-के-बैठे ही रह गए..
उठने की कोशिश की तो साथ में ,कुर्सी उठ आई,
उन्होंने , जोर से आवाज़ लगाई-किसने बनाई है?

चपरासी ने पूछा,, क्या?
क्या के बच्चे!! कुर्सी!!
क्या तेरी शामत आई है?
जाओ फ़ौरन उस बढ़ई को बुलाओ.

बढ़ई बोला"
सर मेरी क्या ग़लती है,
यहां तो ठेकेदार साब की चलती है..
उन्होंने कहा- कुर्सियों में वेस्ट भर दो, सो भर दी 
कुर्सी, आलपिनों से लबरेज़ कर दी..

मैंने देखा कि आपके दफ़्तर में 
काग़ज़ बिखरे पड़े रहते हैं 
कोई भी उनमें आलपिनें नहीं लगाता है..

प्रत्येक बाबू
दिन में कम-से-कम डेढ़ सौ आलपिनें नीचे गिराता है..
और बाबूजी,नीचे गिरने के बाद तो हर चीज़ वेस्ट हो जाती है
कुर्सियों में भरने के ही काम आती है..

तो हुज़ूर,
उसी को सज़ा दें जिसका हो कुसूर..
ठेकेदार साब को बुलाएंवे ही आपको समझाएं..
सज़ा दें जिसका हो कुसूर..
ठेकेदार साब को बुलाएंवे ही आपको समझाएं..
अब ठेकेदार बुलवाया गया, सारा माजरा समझाया गया.

ठेकेदार बोला
बढ़ई इज़ सेइंग वैरी करैक्ट सर!
हिज़ ड्यूटी इज़ ऐब्सोल्यूटली परफ़ैक्ट सर!

सरकारी आदेश है कि सरकारी सम्पत्ति का सदुपयोग करो
इसीलिए हम बढ़ई को बोला कि वेस्ट भरो.
ब्लंडर मिस्टेक तो आलपिन कंपनी के प्रोपराइटर का है,
जिसने वेस्ट जैसा चीज़ को इतना नुकीली बनाया.
और आपको धरातल पे कष्ट पहुंचाया... "वैरी वैरी सॉरी सर"

अब बुलवाया गयाआलपिन कंपनी का प्रोपराइटर पहले तो वो घबरायासमझ गया तो मुस्कुराया...

बोला
श्रीमान, मशीन अगर इंडियन होती तो आपकी हालत ढीली न होती
क्योंकि पिन इतनी नुकीली न होती पर हमारी मशीनें तो अमरीका से आती हैं और वे आलपिनों को बहुत ही नुकीला बनाती हैं..

अचानक आलपिन कंपनी के मालिक ने सोचा अब ये अमरीका से किसे बुलवाएंगे
ज़ाहिर है मेरी ही चटनी बनवाएंगे...
इसलिए बात बदल दी औरअमरीका से
भिलाई की तरफ डायवर्ट कर दी.......😁😁😁😂😂😄😄




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