Monday, 20 February 2017

राहत इंदोरी के टॉप 10 गज़ले

Ghazals of Rahat Indori

राहत इंदोरी जी किसी परिचय के मोहताज़ नहीं हैं. उनके  द्वारा लिखी गज़ले जिसे आज भी हम गुनगुनाते हैं उनके द्वारा लिखी हर ग़ज़ल की लाइनें जैसे कम शब्दों में हर बात को बया कर जाती हैं.  बताते चले की राहत इंदोरी जी का जन्म 1 जनवरी 1950 में इंदौर में हुआ उनके पिता जी और माता जी का नाम रफ्तुल्लाह कुरैशी और मकबूल उन निशा बेगम था उनके पिता कपड़ा मिल के कर्मचारी थे राहत इंदोरी जी बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय, भोपाल में 1975 में  उर्दू साहित्य में MA किया।. और उसके बाद  1985 में मध्य प्रदेश में स्थित  मध्य प्रदेश भोज मुक्त विश्वविद्यालय से उर्दू साहित्य में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की. सबसे पहले उन्होंने अपने कॉलेज के दिनों में अपनी पहली शायरी सुनाई थी जब वे केवल 19 वर्ष के थे
Collection-of-Rahat-Indori-Shayari-and-Ghazals

और आज का दिन हैं उन्होंने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा और वो आगे निकलते गए लेखन कार्य में. हमेशा दिल को छु लेने वाली शायरियां व गज़ले लिखी. तो आज इस आर्टिकल के माध्यम से पढ़ते हैं  और गुनगुनाते हैं राहत इंदोरी जी द्वारा वो चुनिन्दा वो 10 गज़ले जो आज सबसे ज्यादा  प्रसिद्ध हैं ..

Log Har Mod Pe Ruk Ruk Ke Sambhalte Kyon Hain


लोग हर मोड़ पे रुक-रुक के संभलते क्यों हैं
इतना डरते हैं तो फिर घर से निकलते क्यों हैं

मैं न जुगनू हूँ, दिया हूँ न कोई तारा हूँ
रोशनी वाले मेरे नाम से जलते क्यों हैं

नींद से मेरा त’अल्लुक़ ही नहीं बरसों से
ख्वाब आ आ के मेरी छत पे टहलते क्यों हैं

मोड़ होता है जवानी का संभलने के लिए
और सब लोग यहीं आके फिसलते क्यों हैं

Log Har Mod Pe Ruk Ruk Ke Sambhalte Kyon Hain


लोग हर मोड़ पे रुक-रुक के संभलते क्यों हैं
इतना डरते हैं तो फिर घर से निकलते क्यों हैं

मैं न जुगनू हूँ, दिया हूँ न कोई तारा हूँ
रोशनी वाले मेरे नाम से जलते क्यों हैं

नींद से मेरा त’अल्लुक़ ही नहीं बरसों से
ख्वाब आ आ के मेरी छत पे टहलते क्यों हैं

मोड़ होता है जवानी का संभलने के लिए
और सब लोग यहीं आके फिसलते क्यों हैं

Ek Din Dekhkar Udaas Bahut


एक दिन देखकर उदास बहुत
आ गए थे वो मेरे पास बहुत

ख़ुद से मैं कुछ दिनों से मिल न सका
लोग रहते हैं आस-पास बहुत

अब गिरेबाँ बा-दस्त हो जाओ
कर चुके उनसे इल्तेमास* बहुत

किसने लिक्खा था शहर का नोहा
लोग पढ़कर हुए उदास बहुत

अब कहाँ हम-से पीने वाले रहे
एक टेबल पे इक गिलास बहुत

तेरे इक ग़म ने रेज़ा-रेज़ा किया
वर्ना हम भी थे ग़म-श्नास बहुत

कौन छाने लुगात* का दरिया
आप का एक इक्तेबास* बहुत

ज़ख़्म की ओढ़नी, लहू की कमीज़
तन सलामत रहे लिबास बहुत


Kaali Raaton Ko Bhi Rangeen Kaha Hai Maine


काली रातों को भी रंगीन कहा है मैंने
तेरी हर बात पे आमीन कहा है मैंने

तेरी दस्तार पे तन्कीद की हिम्मत तो नहीं
अपनी पापोश को कालीन कहा है मैंने

मस्लेहत कहिये इसे या के सियासत कहिये
चील-कौओं को भी शाहीन कहा है मैंने

ज़ायके बारहा आँखों में मज़ा देते हैं
बाज़ चेहरों को भी नमकीन कहा है मैंने

तूने फ़न की नहीं शिजरे की हिमायत की है
तेरे ऐजाज़ को तौहीन कहा है मैंने


Ishq Mein Jeet Ke Aane Ke Liye Kafi Hu


इश्क़ में जीत के आने के लिये काफी हूँ
मैं अकेला ही ज़माने के लिये काफी हूँ

हर हकीकत को मेरी ख्वाब समझने वाले
मैं तेरी नींद उड़ाने के लिये काफी हूँ

ये अलग बात के अब सुख चुका हूँ फिर भी
धूप की प्यास बुझाने के लिये काफी हूँ

बस किसी तरह मेरी नींद का ये जाल कटे
जाग जाऊँ तो जगाने के लिये काफी हूँ

जाने किस भूल भुलैय्या में हूँ खुद भी लेकिन
मैं तुझे राह पे लाने के लिये काफी हूँ

डर यही है के मुझे नींद ना आ जाये कहीं
मैं तेरे ख्वाब सजाने के लिये काफी हूँ

ज़िंदगी…. ढूंडती फिरती है सहारा किसका ?
मैं तेरा बोझ उठाने के लिये काफी हूँ

मेरे दामन में हैं सौ चाक मगर ए दुनिया
मैं तेरे एब छुपाने के लिये काफी हूँ

एक अखबार हूँ औकात ही क्या मेरी मगर
शहर में आग लगाने के लिये काफी हूँ

मेरे बच्चो…. मुझे दिल खोल के तुम खर्च करो
मैं अकेला ही कमाने के लिये काफी हूँ


Sula Chuki Thi Ye Duniya Thapak Thapak Ke Mujhe


सुला चुकी थी ये दुनिया थपक थपक के मुझे
जगा दिया तेरी पाज़ेब ने खनक के मुझे

कोई बताये के मैं इसका क्या इलाज करूँ
परेशां करता है ये दिल धड़क धड़क के मुझे

ताल्लुकात में कैसे दरार पड़ती है
दिखा दिया किसी कमज़र्फ ने छलक के मुझे

हमें खुद अपने सितारे तलाशने होंगे
ये एक जुगनू ने समझा दिया चमक के मुझे

बहुत सी नज़रें हमारी तरफ हैं महफ़िल में
इशारा कर दिया उसने ज़रा सरक के मुझे

मैं देर रात गए जब भी घर पहुँचता हूँ
वो देखती है बहुत छान के फटक के मुझे


Maum Ke Paas Kabhi Aag Ko Lakar Dekhun


मौम के पास कभी आग को लाकर देखूँ
सोचता हूँ के तुझे हाथ लगा कर देखूँ

कभी चुपके से चला आऊँ तेरी खिलवत में
और तुझे तेरी निगाहों से बचा कर देखूँ

मैने देखा है ज़माने को शराबें पी कर
दम निकल जाये अगर होश में आकर देखूँ

दिल का मंदिर बड़ा वीरान नज़र आता है
सोचता हूँ तेरी तस्वीर लगा कर देखूँ

तेरे बारे में सुना ये है के तू सूरज है
मैं ज़रा देर तेरे साये में आ कर देखूँ

याद आता है के पहले भी कई बार यूं ही
मैने सोचा था के मैं तुझको भुला कर देखूँ


Dil Mera Der Tak Dhadakata Raha .


छू गया जब कभी ख्याल तेरा
दिल मेरा देर तक धड़कता रहा

कल तेरा ज़िक्र छिड़ गया घर में
और घर देर तक महकता रहा

रात हम मैक़दे में जा निकले
घर का घर शहर मैं भटकता रहा

उसके दिल में तो कोई मैल न था
मैं खुद जाने क्यूँ झिझकता रहा

मुट्ठियाँ मेरी सख्त होती गयी
जितना दमन कोई भटकता रहा

मीर को पढते पढते सोया था
रात भर नींद में सिसकता रहा





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